April 21, 2024
Jharkhand News24
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अपने जिले के जिस प्रेरक व्यक्तित्व के विषय में लिखने का यत्न कर रही हूँ वे मेरे जनपद के लाल हैं , हमारे लिए प्रेरक हैं, श्रेष्ठ हैं एवं सारस्वत साधना उदाहरण हैं ।

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प्रेरक व्यक्तित्व – डॉ रामजन्म मिश्र

अपने जिले के जिस प्रेरक व्यक्तित्व के विषय में लिखने का यत्न कर रही हूँ वे मेरे जनपद के लाल हैं , हमारे लिए प्रेरक हैं, श्रेष्ठ हैं एवं सारस्वत साधना उदाहरण हैं ।

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वे स्वनामधन्य आर्य व्यक्तित्व के धनी पारम्परिक परिधान धोती, कुरता, चादर से सुसज्जित एवं वानप्रस्थ वय को पार करनेवाला कदम बढा़ चुके डॉ० रामजन्म मिश्र हैं । जिनका जन्म गोपालगंज जिले के महारानी नामक गाँव में २० दि०१९४६ में हुआ था ।
नारायणी के तीर पर जिले के पूर्वोत्तर भाग में स्थित यह गाँव आज से ७५ वर्षो पूर्व आज के विकास के मानक से अपरिचित था। उस वक्त की जब मैं कल्पना करती हूँ तो पाती हूँ-तब हमारे गाँवों पास साधन के रूप में “जीवट” के अलावे अन्य साधन नगण्य थे । यातायात के रूप में नाव, बैलगाडी़ ,टमटम या एक्का दुक्का सायकिलें थीं । तब गोपालगंज में एक मात्र सदर अस्पताल था , रेलवे थी पर गाँवों से काफी दूर , उसी तरह स्कूल भी सुदूर हीं थे , किन्तु
नारायणी के मृदुल जल से सिंचित यह भूभाग अद्भुत रूप से उर्वर है । अन्न धन के संग यह पुण्य भूमि प्रतिभावान संतति भी प्रदान करती रही है।
एक सरल सच्चे ब्राह्मण वंश में भौतिक साधनों की बहुतायत नहीं होती , फिर भी शिवजी इतना तो अवश्य ही देते हैं कि वह अपने कलेजे के टुकड़े का लालन पालन एवं सुशिक्षण ढंग से करले , बस भावना और परिश्रम चाहिए ।
साथ ही हमारे गाँवों की भावभूमि में एक अव्यक्त श्रद्धा रची बसी है जिसमें एक माँ की कामना होती है कि मेरा पुत्र ‘राम’ हो उसका जन्म ‘रामजन्म’ हो।
अवश्य हीं श्रद्धेय मिश्रजी की माताजी के सरल हृदय में यह भावना थी कि पुत्र हो तो राम जैसा । वैसे उस युग में नामकरण घर के श्रेष्ठ जन ही करते थे , पर मेरा प्रत्यय है कि एक माँ की भावना फलित हुई । बेटे का नाम रामजन्म रखा गया जो आगे चलकर
सार्थक सिद्ध हुआ ।

उन दिनों विद्यार्थी पैदल चलकर या समूह में दौड़ते हुए भी अपने विद्यालय जाते थे , दस पन्द्रह कि०मी० की दूरी उन किशोर या नव युवा लड़कों के लिए कुछ नहीं था, हाँ परीक्षा के दिनो में स्कूल के निकट डेरा ले लेते और अपना भोजन स्वयं पका लेते थे ।
उसी काल खण्ड में मिश्रजी भी विद्यार्थी थे , यानी उसी श्रमसाध्य विधि से इन्होने भी शिक्षा ग्रहण की और आगे चलकर अपना कर्मक्षेत्र अध्यापन को चुना। साथ में स्वाध्याय करते रहे जिससे इनकी प्रतिभा मे निरंतर निखार आता गया ।ये अपने कर्मक्षेत्र में अथक परिश्रम के अद्वितिय उदाहरण हैं , मै तो अक्सर इनके कार्यो की सूचि देख प्रेरणा लेती हूँ ।
समभवतः 1987-88 की बात है मा० मिश्र जी हमारे बाबूजी के पास कुछ दिनों के प्रवास पर रहे थे । बाबूजी स्वयं भी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे और प्रतिभावानों का भी हार्दिक सम्मान करते थे , किन्तु वह जमाना पिताओं का था आज की तरह पापा का नहीं जिसमें बेटे बेटी से फ्रेंड्ली रहने की मजबूरी है। हमारे समय में बाप का दबदबा होता था , बच्चे चाहे लाखों मनौतियों पर हुए हो फिर भी पिता के अनुशासन में ही रहना था , हम भाई बहन तो रहते ही थे , दरअसल लिखते हुए उस समय का सिचुएशन याद आ गया । हाँ तो हम बच्चे लोग दूर से ही देखा करते कि कोई कलाकार, रचनाकार, क्रीड़ाविद्, गायक वादक आये हैं । जिनका सत्कार हो रहा है , किन्तु बिना बाबूजी के पुकारे वहाँ जाने की जुर्रत कोई नहीं कर सकता था , हाँ वे स्वयं जितना आवश्यक समझते परिचय देते । अपने उसी स्वभाव वश एक दिन दै० हिन्दुस्तान का मध्य पेज दिखाते हुए
कहे कि यह आर्टिकल पढो़ ,रामजन्म जी का लिखा है । उन दिनों पत्रकारिता का अपना वजन था , उसपर मध्य पृष्ट पर छपना , हमारे ऊपर एक छवि अंकित हो गई ।
अपने पूर्वजों की नींव से दूर ,गोपालगंज के धूर गाँव से जा कर साहिबगंज में स्वयं को कलम की जय बोल कर सिद्ध करना सामान्य तपस्या की बात नहीं है , यह बिना गुरू भक्ति और और ईश्वर की कृपा के संभव नहीं हो सकती , वह भी ऐसे समय में जब देश पर समाजवाद एवं प्रगतिशीलता का अमर बेल आच्छादित हो रहा हो वैसे में अपने को थाम्ह के रह लेना उदाहरण के लिए पर्याप्त है ।
उन दिनों बिहार अखण्ड था मैं समझती हूँ तब तक मिश्रजी वर्तमान झारखण्ड में अध्यापन तथा साहित्यिक क्षेत्र में अपना पाँव रोप चूके थे और अब तो उनके सम्मान की ही बारी है ।
दरअसल 1988 से लेकर 2017 के अंतराल में ये यादों में तो थे पर पुनः घर आना जाना नहीं हुआ था ।वह तो भला हो आभासी पटल का जिसने इस आत्मीयता को पुनर्नवा किया ।
असल में 1999 या 2000 सन् में पिरो से चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह आरोही जी का पत्र आया कि वे भोजपुरी का संदर्भ ग्रंथ प्रकाशित करने की तैयारी में हैं । जिसके लिए आप भी अपना जीवनवृत भेजें । और इस आशय का पत्र बार बार आने लगा ।
शायद उधर आरोही जी समझते थे कि उनके पत्र डाक मे खो जा रहे है अतः वे बार बार आग्रह भरा पत्र लिख रहे थे इधर बाबूजी पत्रों को पढ़कर सिरहाने रख देते थे ।
बाबूजी उम्र की जिस पडा़व पर थे उसमें आत्म- प्रकाशन बचपना लग रहा था ।उधर आनेवाले पत्र बता रहे थे कि किन्हीं वयोवृद्ध का आग्रह है जिसका सम्मान होना चाहिए । तब मैं एक दिन साहस कर पूछ ली -बाबुजी ये पत्र बार बार आ रहे हैं और आप चुपचाप सिरहाने रख देते हैं?
हाँ मैं इनकी इच्छा को सम्मान तो देता हूँ पर अपने लेखन को वैसा गंभीर नहीं समझता ।
मैं उनकी बात से चुप हो गई हम सब मुँहलग्गे नहीं थे , पर मैं सारे आदर्शों के संग भी कुछ मनमानी कर लेती थी , बस चुपचाप बाबूजी का एक जीवनवृत लिख कर पोस्ट कर दी , क्योंकि बाबूजी के लिखे नाटक बड़े प्रभावी एवं कविताएँ तीक्ष्ण धारदार होती थीं ।जिसे वे स्वयं अपने मंच से सुनाते थे । उपरोक्त प्रसंग लिखने का कारण यह था कि जब आभासी पटल पर उस ग्रंथ के छपने की चर्चा आई तो मैने एक और बालपन कर डाला कि उन पत्रों का फोटो लेकर उस पटल पर डाल दी । जिसका फौरन लाभ यह हुआ कि आदरणीय मिश्र जी का उत्तर मे आशीर्वाद आया साथ में उन्होंने सबका कुशल क्षेम पू़छा ।
मैं मिश्रजी को पहचान कर अभिभूत हुई । और उनके स्नेहाशीष भावित भी , असल में पितृव्यविहिन होने के बाद से संसार के शुष्क तप्त होने का अनुभव बारम्बार हो रहा था वैसे में अहैतुक स्नेह स्वस्ति बरसा रहा था । एक और बात थी मिश्रजी एवं मेरे चाचाजी की छवि में सादृश्यता है जिससे अपनापन लगना स्वभाविक है । साथ में यह संस्मरण लिखते हुए स्पष्ट हुआ कि आरोही जी को अवश्य ही बाबूजी का पता मिश्रजी ने ही दिया हुआ था , क्योंकि कहाँ पिरो और कहाँ बरौली फिर बाबूजी छपने छपवाने के फेरे में हम सब के देखते तो कभी रहे नहीं बस स्वायंतः सुखाय लिखा ,अपने मंच पर सुना कर संतुष्ट हुए पर इस निःस्पृहता का नतिजा यह हुआ कि उनके तथा कथित शिष्य उनकी रचनाएं उडा़ ले गये ।
मिश्र जी से सुप्रभावित होने का एक कारण यह भी है कि मात्र पाँच सात दिनों के सानिध्य में वे बाबूजी को साहित्य के एक बडे़ फलक पर लाने का प्रयास किया, जिसको स्वयं वे निरंतर कठोर परिश्रम से पाये होगें । यह चीज साहित्यिक क्षेत्र में कोई किसी को नहीं देता , अतः मैं अनुग्रहित होने की अनुभूति की ।
आभासी पटल पर इनसे जुड़ने का एक बडा़ लाभ यह हुआ कि इनके साहित्यिक अवदानों से मैं परिचित हुई । लेख संस्मरण , पत्रकारिता के आयाम के साथ साथ इनका विभिन्न साहित्यक मंचो से सम्मानित होना , मुझे गर्व से भर देता है , आत्मबल भी बढा़ता है ।
इनका विरल पर सहज व्यक्तित्व इनके भक्ति और साधना का परिचय अपनी उपस्थिति से दे देता है। प्रकट हो जाता है कि ये गाँव के हैं और साहिबगंज में निवास करने के बाद भी वहाँ प्रवासी ही है यहाँ महारानी गाँव में ही हैं ।।
2021 के 30 अप्रैल को जब कोरोना काल था ये अपने आश्रम जो गोपालगंज के कोईनी नामक गाँव में अवस्थित है आये थे , तब हम सब से मिलने घर पर आये जो इनके शुद्ध वात्सल्य का प्रतिक था । लगभग दो घंटे तक बातें किये -लोक और परंपरा को जीवंत रखने की , गाँव में होने और गाँव के होने की ।
इसी बातचीत के क्रम में अपनी दो अनमोल पुस्तकें भी सस्नेह दिया । १-गंगाजल । २- भक्ति यात्रा के प्रेरक प्रसंग ।
गंगाजल -देश के महान सिद्ध लेखकों का गंगा नदी के लिए श्रद्धासुमन भरा दिव्य निबंधो का संकलन है , और भक्तियात्रा के प्रेरक प्रसंग पोथी को कोई साधक ही लिख सकता है । मैं तो पा कर और पढकर सुखद आश्चर्य से भर गई -कहाँ कलयुग है भाई ? अपने मनिषियों से मिलिये तो आप को पता चलेगा -यहाँ तप है सद् और सत् है ।
आज ये अपने सारस्वत साधना के जिस मुकाम पर हैं वहाँ इन्हें जिले की परिधि में रखना भूल होगी क्योकि देश के कोने कोने से इन्हें सम्मान स्नेह मिल रहा है जो इनके सार्वभौमिकता का प्रतिक है पर इनकी जन्मस्थली महारानी को अवश्य नमन करूँगी जिसने इन्हें जन्म दिया पाला पोसा सँवारा ।
आज हम जिलेवासियों के लिए वे अग्रज हैं और उस दर्द से अवश्य अवगत हैं जिसे शुद्र राजनीति ने दिया है -बिहार और गोपालगंज की छवि को लभेरने की उसे स्वच्छ कर पल्लवित पुष्पित करने का पुण्य कार्य साहित्य के सभी विधाओं से जुड़े युवा और प्रौढ़ कवि लेखक फिल्मकार वैज्ञानिक प्राध्यापक अध्यापक आदि मिलकर कर रहे है उन सभी को अपने इन अग्रज पर गर्व होता है कि वनांचल में जा कर इन्होंने जो लव प्रज्वलित की जो हमारे लिए प्रेरक बना । इस अमृत महोत्सव वर्ष में इनके अभिनंदन में दो शब्द लिखने का सुअवसर मिला ।

मंजूश्री

बरौली

गोपालगंज ।

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