युवाओं के कंधों पर भारत के स्वर्णिम भविष्य की जिम्मेदारी : मदन माधुर्य,
पाकुड़िया, (पाकुड़)
सभी युगों में भारतवर्ष के युवाओं ने अपनी कर्मठता, साहस और पुरुषार्थ के बल पर राष्ट्र को समृद्धि के शिखर तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। युवा शक्ति सदैव नई पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रही है। भारत के प्राचीन चिंतन में भी युवावस्था को कर्म, दायित्व और राष्ट्र निर्माण का महत्वपूर्ण काल माना गया है।
सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर और कलियुग के प्रारंभिक काल तक भारतवर्ष में गुरुकुल शिक्षा की समृद्ध परंपरा रही। आर्यावर्त, जम्बूद्वीप और भारतवर्ष की पावन धरती पर स्थापित गुरुकुलों में शिष्यों को केवल पुस्तकीय ज्ञान ही नहीं, बल्कि पारिवारिक, सामाजिक, आध्यात्मिक, राजनीतिक, युद्धकला और मानव कल्याण से जुड़े विषयों का भी प्रशिक्षण दिया जाता था। उद्देश्य यही था कि शिक्षा प्राप्त करने के बाद युवक अपने पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्वों का दृढ़ता से निर्वहन कर सके।
गुरु अपने शिष्यों को ज्ञान प्रदान करते थे, लेकिन उस ज्ञान को ग्रहण करना शिष्य की तत्परता और लगन पर निर्भर करता था। इसे एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है। यदि वर्षा होती रहे और घड़ा उल्टा रखा हो तो उसमें वर्षा का जल नहीं भर सकता। इसके लिए वर्षा को दोष नहीं दिया जा सकता। उसी प्रकार गुरु द्वारा दिए गए ज्ञान का लाभ तभी संभव है, जब शिष्य उसे एकाग्रता, अनुशासन और लगन के साथ ग्रहण करे।
भारत की प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा में धर्म का अर्थ केवल उपासना या कर्मकांड तक सीमित नहीं रहा। धर्म का एक व्यापक अर्थ कर्तव्य भी है। व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करना भी धर्म का ही एक स्वरूप माना गया है। सनातन सांस्कृतिक चिंतन में वही आचरण श्रेष्ठ माना गया है जिसमें स्वयं के साथ समाज और समस्त प्राणियों के कल्याण की भावना निहित हो।
इसी दृष्टि से युवावस्था को कर्म और दायित्व निर्वहन का महत्वपूर्ण काल माना गया। युवाओं में शारीरिक ऊर्जा, मानसिक उत्साह, सीखने की क्षमता और नए लक्ष्य निर्धारित करने का साहस अधिक होता है। उचित शिक्षा, संस्कार और मार्गदर्शन मिलने पर यही ऊर्जा परिवार, समाज और राष्ट्र की प्रगति का आधार बन सकती है।
भारतीय इतिहास और परंपरा में श्रीराम का जीवन आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। उन्होंने गुरुजनों से प्राप्त शिक्षा और संस्कारों के आधार पर पुत्र, शिष्य, पति तथा राजा के रूप में अपने दायित्वों का निर्वहन किया। इसी प्रकार द्वापर युग के अर्जुन, कर्ण, एकलव्य और अभिमन्यु जैसे पात्रों के जीवन में युवावस्था की क्षमता, परिश्रम और लक्ष्य के प्रति समर्पण के अनेक प्रसंग मिलते हैं। श्रीकृष्ण के जीवन और उनके लोककल्याणकारी कार्यों से भी कर्तव्य, नीति और मानव कल्याण की प्रेरणा ली जाती है।
किसी भी राष्ट्र का अतीत उसके वर्तमान को दिशा देने वाला और भविष्य के निर्माण का आधार होता है। भारत का इतिहास संघर्ष, ज्ञान, संस्कृति और त्याग की अनेक प्रेरक गाथाओं से भरा हुआ है। लंबे पराधीन काल के दौरान भी युवाओं ने विदेशी शासन के विरुद्ध संघर्ष किया और स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अनेक युवाओं ने राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन समर्पित किया।
स्वतंत्रता के बाद भारत ने संवैधानिक लोकतंत्र और पंथनिरपेक्ष व्यवस्था को अपनाया। इस व्यवस्था में सभी नागरिकों के अधिकार और कर्तव्य महत्वपूर्ण हैं। इसके बावजूद सामाजिक स्तर पर जातीय, क्षेत्रीय और अन्य विभाजनों की चुनौतियां समय-समय पर सामने आती रही हैं। राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता को मजबूत करना आज भी हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
आज 21वीं सदी प्रतिस्पर्धा, तकनीकी परिवर्तन और तेज सामाजिक बदलाव का दौर है। युवाओं के सामने अवसर भी अनेक हैं और चुनौतियां भी कम नहीं। बदलती जीवनशैली, पारिवारिक और सामाजिक संबंधों में बदलाव तथा भविष्य को लेकर बढ़ता दबाव युवाओं के मानसिक और भावनात्मक जीवन को प्रभावित कर सकता है। ऐसे समय में परिवार, विद्यालय और समाज की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि युवाओं को संवाद, सहयोग, संस्कार और उचित मार्गदर्शन का वातावरण मिले।
किशोरावस्था से युवावस्था में प्रवेश जीवन का अत्यंत महत्वपूर्ण चरण है। इस समय माता-पिता, विशेषकर माता की भूमिका के साथ-साथ पूरे परिवार का सहयोग और संवेदनशील व्यवहार युवा के व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देता है। युवाओं के सपनों को सही दिशा देने के लिए केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, अनुशासन, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी की भावना भी आवश्यक है।
भारत विश्व के उन देशों में है जहां युवा आबादी की हिस्सेदारी महत्वपूर्ण है। यह युवा शक्ति देश की सबसे बड़ी संभावनाओं में से एक है। आवश्यकता केवल इतनी है कि युवा अपनी ऊर्जा को सकारात्मक दिशा में लगाएं, ज्ञान और कौशल प्राप्त करें तथा अपने व्यक्तिगत विकास के साथ समाज और राष्ट्र के विकास में भी योगदान दें।
हमारा स्वर्णिम अतीत केवल गौरव का विषय न बने, बल्कि वर्तमान के लिए प्रेरणा का स्रोत बने। युवाओं को अपनी क्षमता पहचाननी होगी, लक्ष्य निर्धारित करना होगा और निरंतर परिश्रम के साथ आगे बढ़ना होगा। परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों को समझते हुए यदि युवा शक्ति संकल्प और कर्मठता के साथ आगे बढ़े तो भारत के भविष्य को नई ऊंचाइयों तक ले जाने की अपार संभावनाएं हैं।
संदेश स्पष्ट है—युवा शक्ति जागृत हो, सकारात्मक दिशा में आगे बढ़े और अपने कर्म से राष्ट्र के स्वर्णिम भविष्य का निर्माण करे। कल हमारा है और उस कल की नींव आज के युवा ही रखेंगे।
