परिवार मानव की प्रथम पाठशाला एवं माता पहली गुरु : मदन माधुर्य
झारखंड न्यूज़ 24
पाकुड़िया, पाकुड़
भारतीय मान्य संस्कृति में परिवार को मानव की प्रथम पाठशाला और माता को पहली गुरु कहकर माता को पहले नमन करते हुए पिता को प्रणाम करने कहा गया है। माता ही अपनी संतान को दस महीनों तक गर्भ में धारण कर असहनीय पीड़ा झेल शिशु जनती है और पहली बार मानव धरा पर आते ही माता की स्नेह-ममत्व की छांव में पलता है और संस्कारित होता है। माता को प्रथम गुरु इसलिए कहा गया है कि माता ही अच्छी-सच्ची या अपने नैतिक-अनैतिक शिक्षा तथा अपने दैनिक जीवन में होती रही कार्यशैली व अपने चिर संचित संस्कारों को बाल्यकाल से देती है जिसे निश्चल बाल मन ग्रहण करता है तथा आयु बढ़ने के साथ वह प्रवृत्ति में ढलकर संस्कार में परिणत होता है जिसे स्वभाव कहा जाता है।
महर्षियों का कथन है कि आठ माह में शिशु का मस्तिष्क तैयार हो जाता है और वह चेतन अवस्था में होता है। तभी तो अष्टावक्र ऋषि माता के गर्भ में ही अपने पिता के वचनों को ग्रहण कर शास्त्रार्थ में निपुण और पिता से अभिशापित तथा अंततः शाप मुक्त भी हुए।
स्मृति-उपनिषदों में कई ऐसी माताओं का उदाहरण मिलता है जिन्होंने अपनी महत्वाकांक्षी कुवृत्ति व कुसंस्कारों की वशीभूत होकर दिति ने दानवों और कैकसी ने रावण-सूर्पणखा जैसे पुत्र-पुत्री को जन्म दिया। पर सर्वगुण संपन्न व महाबली अति महत्वाकांक्षी रावण व सूर्पणखा का दुखद अंत हुआ। वहीं दूसरी ओर कयाधु जैसी संस्कारी माता ने प्रह्लाद जैसे धर्मात्मा प्रजापालक सम्राट को जन्म दिया।
उल्लेखनीय है कि सृष्टि के क्रम में आदि महाशक्ति शालिनी महामाया जगदंबा ने अपनी योगमाया से प्रथम भगवान विष्णु और उनकी नाभि कमल से ब्रह्मदेव तथा मां भवानी ने पुनः शिव को प्रकट कर विश्व कल्याण के निमित्त तीन देवियों लक्ष्मी-सरस्वती को प्रकट किया और शिवजी की सहयोगिनी बनीं महादेवी स्वयं।
अस्तु माता सनातनी ने विश्व कल्याण के निमित्त सृष्टि विस्तार के क्रम में ब्रह्मदेव को सृष्टि का पालन विष्णु एवं संहार का दायित्व महादेव को दिया और सृष्टि विकास का क्रम बढ़ा।
सनातन अथवा भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों में विश्व ब्रह्मांड की रचना से लेकर सतयुग त्रेता द्वापर एवं कलियुग में ईसा की सातवीं सदी तक भारत की पावन धरा पर संयुक्त परिवार में माताओं से उच्च नैतिक शिक्षा व गुरुकुलों में आध्यात्मिक परिवार समाज व राष्ट्रीय हित का शिक्षण-प्रशिक्षण ग्रहण कर चक्रवर्ती सम्राटों से लेकर नागरिकों ने अपने-अपने स्तर पर तथा अपनी क्षमता के अनुरूप कर्मों के बल पर भारतवर्ष को ऊंचाई प्रदान की।
भारतवर्ष सातवीं से बीसवीं सदी तक कुल तेरह सौ सालों तक पराधीन रहा। परंतु सर्वाधिक चिंतनीय प्रसंग यह है कि भारत की अति पुण्य धरा जिसकी मूल अवधारणा में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ रहा है और भारत सृष्टि काल से धर्म-कर्म व आध्यात्म प्रधान राष्ट्र है। पर राष्ट्र की मूल व कालजयी आध्यात्मिक संस्कार की कमी हम भारतीयों में किन कारणों से होती दिख रही है जिससे नैतिक मूल्यों की कमी होते रहने से ही संभवतः इन दिनों भारत की अति पावन भूमि में हमारी माता बहन बेटियों से छेड़छाड़ रेप हत्या आत्महत्या जैसी शर्मनाक देश को कलंकित करने की घटनाएं प्रतिदिन होती रही हैं।
इतना सख्त व कठोर कानून होने के बाद भी भय रहित कृत्य हो रहा है। वर्ष 2012 में निर्भया कांड से लेकर अब तक ऐसे अनेक दुष्कर्म महिलाओं के साथ होते रहे हैं। कठोर कार्रवाई होने के पश्चात भी महिलाएं हर जगह सुरक्षित नहीं हैं। छेड़छाड़ की घटनाएं होती रही हैं।
संभवतः इन दिनों जीवनशैली में बदलाव होते रहने से भारतीय संस्कृति के मूल संस्कार धर्म-कर्तव्य व आध्यात्मिकता में भारी गिरावट होने से संवेदनशीलता की कमी होने के कारण नैतिक मूल्यों में गिरावट देखी जा रही है। इससे दया क्षमा सहिष्णुता सहयोगिता सामाजिकता स्नेह शिष्टता अपनापन जैसे मानवीय गुणों की कमी से विकृत सोच बढ़ी है।
भारत ऐसे राष्ट्र में जहां नारियों की पूजा करने की परंपरा रही है और नवरात्र में कन्याओं की पूजा की जाती है उस देश में नारी से दुष्कर्म किया जा रहा है। समाजशास्त्रियों का मानना है कि महिलाओं से छेड़छाड़ तथा अभद्रता करने वाले दुराचारियों पर तुरंत कार्रवाई हो। इसके साथ ही सामाजिक चेतना सहयोग एवं राष्ट्रीय हित में समर्पित संस्थाएं विशेष रूप से आध्यात्म तथा धर्म की परिभाषा को स्पष्ट तौर पर आमजन को बताएं।
सोशल मीडिया व ट्यूब चैनलों पर भी सख्त कार्रवाई हो ताकि अश्लील फोटो व न्यूज प्रकाशित न कर सकें। वाक्य स्वतंत्रता का अर्थ अश्लीलता नहीं है।
वहीं हम में से अधिकांश लोग धर्म-आध्यात्म का अर्थ केवल देव पूजन ही जानते-मानते रहे हैं और कुछ लोग इसे रूढ़ी कहते रहे हैं। लेकिन उन्हें यह भली-भांति ज्ञात होना चाहिए कि भारतीय या सनातन सांस्कृतिक मूल्यों में आध्यात्म व धर्म पूर्णतः वैज्ञानिक संस्कार हैं जिसके कारण ही भारतीयों में सहिष्णुता शक्तिसंपन्न होने के बावजूद क्षमाशीलता दयालुता ममता आदि मानवीय गुण विद्यमान हैं।
इसी विशिष्ट देव गुणों की परिपूर्णता के कारण ही भारतवर्ष इन दिनों भी ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अवधारणा के आधार पर संपूर्ण विश्व को एक परिवार मानते हुए विश्व कल्याण के निमित्त सृष्टि काल से आज तक महाशक्तिशाली चक्रवर्ती सम्राटों से लेकर अब तक अकारण भारत ने किसी देश पर आक्रमण नहीं किया। अपितु इस युद्धरत विश्व को शांति का संदेश देते हुए योग जैसी शिक्षा प्रदान कर रहा है।
30 सितंबर को देश का वीर सपूत पायलट 174 यात्रियों को अपनी जान जोखिम में डालकर नवजीवन प्रदान कर सनातनी मानवीय मूल्यों की मूल नीति की पुष्टि की।
अस्तु हम भारतीयों को अपने मान्य सांस्कृतिक मूल्यों का गहनतापूर्वक अध्ययन करना राष्ट्रीय हित में होगा। हमें अंग्रेजों द्वारा लिखित ऐतिहासिक तथ्यों से भ्रमित होकर अपनी वैज्ञानिक व कालजयी आध्यात्मिकता पूर्ण सांस्कृतिक मूल्यों की उपेक्षा करना राष्ट्रीय हित में कतई नहीं है।
स्मरण रहे अधर्म-अकर्म करने वालों का प्रतिकार करने को ही भारतीय संस्कृति-परंपराओं में धर्म कहा गया है। क्या श्रीकृष्ण ने यह नहीं कहा है कि धर्म-कर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए मानव अवतार लेता रहूंगा?
