सिर्फ सांसों की लंबाई नहीं, जीवन की खुशहाली भी जरूरी

माँ के उपवास से आगे बढ़कर परिवार में प्रेम, संवाद और सम्मान का संकल्प बने जितिया

माँ के उपवास से आगे बढ़कर परिवार में प्रेम, संवाद और सम्मान का संकल्प बने जितिया
संपादकीय-
जीवित्पुत्रिका व्रत, जिसे सामान्य बोलचाल में जितिया या जिउतिया भी कहा जाता है, भारतीय लोकजीवन में मातृत्व की गहरी संवेदना, आस्था और त्याग का पर्व है। इस व्रत में माताएं अपनी संतान की दीर्घायु, आरोग्य, सुरक्षा और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी से जुड़ा यह पर्व विशेष रूप से बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और मिथिला क्षेत्र की लोक-संस्कृति में गहरी जड़ें रखता है। धार्मिक परंपरा में इसे कठिन निर्जला व्रतों में गिना जाता है और इसके साथ राजा जीमूतवाहन के त्याग तथा संतान की रक्षा की कथा जुड़ी हुई है।
वर्ष 2026 में जितिया व्रत की तिथि को लेकर विभिन्न पंचांगों और धार्मिक मतों में चर्चा दिखाई दे रही है। अनेक प्रकाशित पंचांग-आधारित स्रोत 3 अक्टूबर को व्रत तथा 4 अक्टूबर को पारण का उल्लेख करते हैं। कुछ गणनाओं और परंपराओं में अष्टमी की व्याप्ति तथा उदया तिथि को लेकर अलग-अलग विचार भी सामने आते हैं। इसलिए तिथि के प्रश्न पर किसी एक मत को सार्वभौमिक धार्मिक आदेश के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय स्थानीय परंपरा और मान्य पंचांग के अनुसार निर्णय लेना अधिक उचित है।
लेकिन जितिया के सामने आज केवल तिथि का प्रश्न नहीं है। इससे कहीं बड़ा प्रश्न यह है कि हम इस व्रत की कथा से क्या ग्रहण कर रहे हैं? क्या जितिया केवल संतान की लंबी आयु की कामना तक सीमित है या यह हमें संतान के सुखी, सम्मानजनक और सार्थक जीवन के बारे में भी सोचने का अवसर देता है? यही वह प्रश्न है, जो इस धार्मिक पर्व को कर्मकांड से आगे ले जाकर जीवन-दर्शन से जोड़ता है।
जीवित्पुत्रिका की कथा में राजा जीमूतवाहन का चरित्र त्याग, करुणा और उत्तरदायित्व का प्रतीक बनकर सामने आता है। परंपरागत कथा में जीमूतवाहन दूसरे के संकट को देखकर उससे विमुख नहीं होते, बल्कि पीड़ित परिवार की सहायता के लिए स्वयं संकट के सामने खड़े होते हैं। कथा के विभिन्न प्रचलित रूपों में उनके त्याग और नागवंश की रक्षा का प्रसंग मिलता है।
यहीं जितिया की कथा का सबसे मानवीय पक्ष सामने आता है। संतान की रक्षा केवल उसके लिए प्रार्थना करने से नहीं होती; उसके संकट को समझना, उसके दुःख में साथ खड़ा होना और उसके जीवन को सुरक्षित तथा सम्मानजनक बनाने का प्रयास करना भी उतना ही आवश्यक है। मां का व्रत इसी भावना का प्रतीक है। किंतु यदि इस भावना को व्यापक अर्थ में देखा जाए तो यह केवल मां और बेटे के संबंध तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पूरे परिवार के व्यवहार और सामाजिक उत्तरदायित्व का प्रश्न बन जाती है।
मां अपने पुत्र की दीर्घायु के लिए निर्जला व्रत रखती है। यह वात्सल्य की अत्यंत मार्मिक अभिव्यक्ति है। किंतु हमें यह भी पूछना चाहिए कि दीर्घ जीवन का अर्थ क्या केवल लंबी सांसें हैं? क्या जीवन तभी पूर्ण माना जाएगा जब व्यक्ति वर्षों तक जीवित रहे, भले ही उसके मन में तनाव, अकेलापन, अपमान या निरंतर संघर्ष हो? निश्चित रूप से नहीं। जीवन की सार्थकता में स्वास्थ्य के साथ मानसिक शांति, सम्मान, आत्मीयता, संवाद और अपने निर्णयों के लिए उचित स्थान भी शामिल हैं।
आज के बदलते पारिवारिक परिवेश में यह प्रश्न और महत्वपूर्ण हो गया है। विवाह के बाद कई परिवारों में संबंधों की नई संरचना बनती है। मां के लिए पुत्र वही बच्चा रहता है, जिसे उसने वर्षों तक अपने स्नेह और संघर्ष से पाला है। दूसरी ओर पत्नी के लिए पति जीवनसाथी है, जिसके साथ वह अपना भविष्य, परिवार और जीवन साझा करना चाहती है। दोनों संबंध अपने-अपने स्थान पर स्वाभाविक और महत्वपूर्ण हैं। समस्या तब पैदा होती है, जब प्रेम अधिकार में बदल जाता है और अपेक्षा संबंधों पर दबाव बनने लगती है।
ऐसी परिस्थितियों में कभी-कभी पुत्र दो भावनात्मक संसारों के बीच खड़ा दिखाई देता है। एक ओर मां की भावनाएं होती हैं, दूसरी ओर पत्नी की अपेक्षाएं। यदि संवाद का स्थान आरोप ले ले और समझ का स्थान जिद, तो घर में रहते हुए भी व्यक्ति भीतर से अकेला पड़ सकता है। इसलिए जितिया के अवसर पर हमें केवल यह नहीं सोचना चाहिए कि हमारा बेटा कितने वर्ष जीवित रहेगा, बल्कि यह भी विचार करना चाहिए कि वह किस प्रकार का जीवन जी रहा है।
मां यदि अपने पुत्र की दीर्घायु के लिए व्रत रखती है तो पुत्र का भी दायित्व है कि वह मां के त्याग और भावनाओं का सम्मान करे। लेकिन मां का वात्सल्य भी तभी पूर्ण होगा, जब उसमें पुत्र के स्वतंत्र व्यक्तित्व और उसके जीवन-संघर्ष के लिए सम्मान हो। इसी तरह पत्नी का अधिकार भी तभी स्वस्थ संबंध का आधार बनेगा, जब उसमें पति के पारिवारिक संबंधों और भावनात्मक दायित्वों के लिए समझ हो। पति का कर्तव्य है कि वह दोनों पक्षों के सम्मान और संतुलन को समझे। रिश्ते अधिकार से नहीं, संवाद और संवेदना से मजबूत होते हैं।
यही कारण है कि जितिया की कथा को आज नए सामाजिक संदर्भ में पढ़ने की जरूरत है। व्रत का उद्देश्य भय उत्पन्न करना नहीं, मंगल की भावना जगाना है। यदि कोई मां अपनी संतान के लिए उपवास करती है तो उस उपवास की आत्मा प्रेम है, भय नहीं; आशीर्वाद है, दबाव नहीं; संरक्षण है, अधिकार का प्रदर्शन नहीं।
जीमूतवाहन की कथा हमें व्यक्तिगत जीवन के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व की ओर भी ले जाती है। आज देश और समाज के सामने युवाओं के रोजगार, शिक्षा, आर्थिक अवसर और पलायन जैसे अनेक प्रश्न हैं। छोटे शहरों और गांवों के हजारों युवा बेहतर शिक्षा और रोजगार की तलाश में महानगरों तथा दूसरे राज्यों का रुख करते हैं। यह पलायन हमेशा केवल व्यक्तिगत पसंद नहीं होता; कई बार आर्थिक परिस्थितियां इसके पीछे होती हैं। ऐसे में जितिया का संदेश परिवार की चौखट से निकलकर समाज और शासन की जिम्मेदारी तक पहुंचता है।
यदि एक मां अपने पुत्र की सुरक्षित और दीर्घायु जिंदगी की कामना करती है, तो समाज का भी दायित्व है कि उस युवा को शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन के अवसर मिलें। गांव और छोटे शहरों में ऐसे अवसर पैदा करना, युवाओं को अपने परिवार और परिवेश से जुड़े रहते हुए आगे बढ़ने की संभावना देना और आर्थिक विवशताओं को कम करना किसी भी संवेदनशील समाज की जिम्मेदारी है।
जितिया इसलिए केवल मातृत्व का पर्व नहीं है। यह परिवार के भीतर संबंधों की गुणवत्ता पर विचार करने का अवसर भी है। यह हमें याद दिलाता है कि संतान माता-पिता की संपत्ति नहीं, बल्कि स्वतंत्र व्यक्तित्व है। माता-पिता का स्नेह उसके जीवन की शक्ति बने, उसके निर्णयों पर अनावश्यक बोझ नहीं। संतान का सम्मान भी माता-पिता के प्रति कर्तव्य से अलग नहीं हो सकता। दोनों के बीच संतुलन ही स्वस्थ परिवार की आधारशिला है।
इस वर्ष जितिया पर यदि कोई मां अपनी संतान की लंबी आयु की प्रार्थना करे तो उसके साथ एक और प्रार्थना जुड़ सकती है—संतान स्वस्थ रहे, प्रसन्न रहे, सम्मान के साथ जीवन जिए, उसके मन की बात सुनी जाए और उसके परिवार में प्रेम बना रहे। परिवार में ऐसी स्थिति न बने कि रिश्तों के संघर्ष में कोई व्यक्ति स्वयं को अकेला महसूस करने लगे।
तिथि के संबंध में भी यही संतुलन आवश्यक है। 2026 के लिए प्रकाशित अनेक स्रोत 3 अक्टूबर को जीवित्पुत्रिका व्रत और 4 अक्टूबर को पारण बताते हैं, जबकि पंचांग-गणना और स्थानीय परंपराओं के आधार पर मतांतर की चर्चा भी मिलती है। इसलिए श्रद्धालुओं को अपने क्षेत्र में प्रचलित मान्य पंचांग और विद्वान आचार्य की सलाह के अनुसार व्रत करना चाहिए। धार्मिक आस्था में मतभेद को विवाद का विषय बनाने के बजाय श्रद्धा और परंपरा का सम्मान करना अधिक महत्वपूर्ण है। जितिया का सबसे सुंदर संदेश यही हो सकता है कि मां संतान की आयु मांगे और संतान मां के त्याग को समझे। मां अपने पुत्र को प्रेम दे और पुत्र मां को सम्मान। पत्नी पति के साथ खड़ी हो और पति पत्नी के सम्मान और अधिकार को समझे। परिवार में मतभेद हों तो संवाद का रास्ता बंद न हो। रिश्तों में प्रेम रहे, लेकिन प्रेम के नाम पर किसी व्यक्ति का अपना अस्तित्व न दबे।
जीमूतवाहन की कथा का मर्म भी इसी मानवीय संवेदना में खोजा जा सकता है—दूसरे के जीवन और दुःख को अपना समझना। इसलिए जितिया का व्रत केवल दीर्घायु की प्रार्थना बनकर न रह जाए। यह सुखी जीवन, स्वस्थ संबंध, पारिवारिक संवाद और सामाजिक उत्तरदायित्व का संकल्प बने।
क्योंकि किसी संतान का केवल जीवित रहना पर्याप्त नहीं है; उसका सम्मान के साथ जीना भी उतना ही आवश्यक है। मां के उपवास की सार्थकता तभी पूरी होगी, जब उस उपवास की भावना परिवार के व्यवहार में दिखाई दे। जितिया हमें यही याद दिलाए कि सिर्फ सांसों की लंबाई नहीं, जीवन की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण है; सिर्फ प्रार्थना नहीं, संवेदना भी जरूरी है; सिर्फ व्रत नहीं, उत्तरदायित्व भी आवश्यक है।
यही जीवित्पुत्रिका व्रत की आत्मा है—संतान की दीर्घायु के साथ उसके सुखी जीवन की प्रार्थना और पूरे परिवार के कल्याण का संकल्प।
