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नवरात्र में देवी की आराधना, फिर बेटियों की असुरक्षा क्यों?

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नवरात्र में देवी की आराधना, फिर बेटियों की असुरक्षा क्यों?

आस्था तभी होगी सार्थक, जब समाज में सुरक्षित होगा मातृशक्ति का सम्मान

संपादकीय

शक्ति और भक्ति की अधिष्ठात्री आदिशक्ति मां दुर्गा के पूजनोत्सव शारदीय नवरात्र में पूरा समाज श्रद्धा और आस्था के साथ मां भगवती के विभिन्न स्वरूपों की आराधना कर रहा है। नौ दिनों तक देवी के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना, कन्या पूजन और नारी सम्मान के संकल्प के माध्यम से हम मातृशक्ति के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं। मां दुर्गा से प्रार्थना करते हैं कि वे पीड़ितों और शोषितों के कष्ट दूर करें तथा समाज में व्याप्त बुराइयों, कुरीतियों और दुष्प्रवृत्तियों का विनाश करें।

लेकिन विडंबना देखिए कि जिस समाज में नारी को देवी का स्वरूप मानकर पूजा जाता है, उसी समाज में महिलाओं और मासूम बच्चियों की सुरक्षा आज भी गंभीर सवाल बनी हुई है। नवरात्र के शुरुआती दिनों में झारखंड के कोडरमा जिले से सामने आया एक कथित यौन शोषण का मामला इसी विडंबना को उजागर करता है। मीडिया में आई जानकारी के अनुसार जिले के सिविल सर्जन डॉ. अनिल कुमार पर इलाज के सिलसिले में मदद मांगने आई हजारीबाग की एक नाबालिग बच्ची का कथित यौन शोषण करने का आरोप लगा है। मामले में उनकी गिरफ्तारी की खबर भी सामने आई है। आरोपों की पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से होनी है, लेकिन यदि किसी जिम्मेदार पद पर बैठा व्यक्ति अपने अधिकार और पीड़ित परिवार की विवशता का दुरुपयोग करता है, तो यह केवल व्यक्तिगत नैतिक पतन नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना और संस्थागत विश्वास पर भी गहरा आघात है।

जिस पद पर बैठकर किसी अधिकारी से जरूरतमंदों को राहत, संवेदनशीलता और सुरक्षा देने की अपेक्षा की जाती है, उसी पद का कथित दुरुपयोग अत्यंत चिंताजनक है। इलाज और सहायता की उम्मीद लेकर किसी अधिकारी तक पहुंचने वाला परिवार पहले ही अपनी विवशताओं से जूझ रहा होता है। ऐसे में उसकी मजबूरी का फायदा उठाने का कोई भी प्रयास विश्वास की हत्या है। नाबालिग बच्चियों के मामले में यह संवेदनशीलता और भी जरूरी हो जाती है, क्योंकि उनकी सुरक्षा, गरिमा और अधिकारों की रक्षा करना पूरे समाज और व्यवस्था की सामूहिक जिम्मेदारी है।

यह घटना हमें आत्ममंथन करने के लिए विवश करती है कि क्या हमारी धार्मिक आस्थाएं हमारे सामाजिक आचरण में भी प्रतिबिंबित हो रही हैं? क्या कन्या पूजन करने वाला समाज बेटियों को वास्तविक सुरक्षा और सम्मान दे पा रहा है? क्या नारी को देवी मानने का हमारा संकल्प पूजा-पंडालों और धार्मिक आयोजनों तक ही सीमित रह गया है? यदि एक ओर हम मां दुर्गा की आराधना करते हैं और दूसरी ओर बेटियों की अस्मिता पर संकट बना रहता है, तो हमें अपनी सामाजिक चेतना और नैतिक मूल्यों पर गंभीरता से विचार करना होगा।

नारी सम्मान की बात महज भाषणों, नारों और उत्सवों में ना होकर हमारे जीवन चरित्र, व्यवहार और सामाजिक जिम्मेदारी की कसौटी होनी चाहिए। किसी बच्ची की विवशता का लाभ उठाना, उसकी गरिमा को ठेस पहुंचाना या उसे भय और असुरक्षा के वातावरण में जीने को मजबूर करना सभ्य समाज के माथे पर कलंक है। ऐसे मामलों में कानून को निष्पक्षता और दृढ़ता के साथ अपना काम करना चाहिए। पीड़िता की पहचान और निजता की रक्षा हो, उसे उचित परामर्श एवं सहायता मिले और दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुसार कठोरतम दंड सुनिश्चित किया जाए। साथ ही किसी भी आरोप की निष्पक्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान भी अनिवार्य है।

समाज को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। परिवारों में बेटियों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना, बच्चों को बचपन से ही सम्मानजनक व्यवहार की शिक्षा देना, कार्यस्थलों और सरकारी संस्थानों में जवाबदेही सुनिश्चित करना तथा पीड़ितों को बिना किसी भय के शिकायत दर्ज कराने का वातावरण देना समय की आवश्यकता है। केवल घटना के बाद आक्रोश व्यक्त करना पर्याप्त नहीं होनी चाहिए। ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस सामाजिक और संस्थागत प्रयास जरूरी हैं।

शारदीय नवरात्र हमें केवल शक्ति की उपासना का संदेश नहीं देती बल्कि अन्याय के विरुद्ध खड़े होने, अधर्म का प्रतिकार करने और निर्बलों की रक्षा करने की प्रेरणा भी देता है। मां दुर्गा की आराधना तभी सार्थक होगी, जब हमारी आस्था हमारे आचरण में दिखाई देगी और समाज की प्रत्येक बेटी स्वयं को सुरक्षित, सम्मानित और निर्भय महसूस करेगी।

आइए इस नवरात्र मां जगदंबा से यही प्रार्थना करें कि वे समाज के प्रत्येक व्यक्ति को सद्बुद्धि दें, अन्याय और दुराचार के विरुद्ध खड़े होने का साहस प्रदान करें तथा हर बेटी की गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित करने की प्रेरणा दें। हमारी पूजा केवल मंदिरों में पूजा-अर्चना या दीप जलाने और कन्यापूजन करने तक सीमित न रहने चाहिए। हमें किसी पीड़ित के जीवन में आशा का प्रकाश भी बने।

क्योंकि सच्ची शक्ति की उपासना वही है जिसमें नारी का सम्मान हो। सच्ची भक्ति वही है जिसमें पीड़ित को न्याय मिले और सच्चा धर्म वही है जिसमें इंसानियत सबसे ऊपर हो। अंत में बस इतना ही कि हे मां जगतजनी, सद्बुद्धि दो माँ ताकि समाज में ऐसे कलंकित कृत्य करने की मानसिकता बदलें और समाज में बेटियां सुरक्षित रह सकें ।

प्रस्तुति:
✍ रंजन चौधरी,
सांसद मीडिया प्रतिनिधि, हजारीबाग संसदीय क्षेत्र ।

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