जंतर-मंतर पर पाबंदी, क्या सिमट रही है लोकतंत्र में असहमति की जगह
संपादकीय-
लोकतंत्र की असली ताकत सत्ता की शक्ति में नहीं, बल्कि जनता की आवाज सुनने की उसकी क्षमता में होती है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफलता इस बात से तय नहीं होती कि वहां सरकार के फैसलों का कितना समर्थन होता है, बल्कि इस बात से तय होती है कि असहमति रखने वालों को अपनी बात कहने की कितनी स्वतंत्रता प्राप्त है। जब कोई नागरिक अपनी समस्याओं को लेकर सड़क पर उतरता है, जब कोई नौजवान रोजगार की मांग करता है, जब कोई किसान अपनी फसल का उचित मूल्य चाहता है और जब कोई सामाजिक कार्यकर्ता न्याय की आवाज उठाता है, तब वह केवल अपनी मांग नहीं रख रहा होता, बल्कि लोकतंत्र की उस परंपरा को जीवित रख रहा होता है, जिसमें जनता को सत्ता से सवाल पूछने का अधिकार प्राप्त है। ऐसे में दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर को धरना-प्रदर्शन के अधिकृत स्थलों की सूची से हटाने का निर्णय केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता को लेकर गंभीर विमर्श का विषय बन जाता है। गृह मंत्रालय के आदेश और दिल्ली पुलिस के नए स्टैंडिंग ऑर्डर एलएंडओ/48/2026 के तहत सामने आई जानकारी के अनुसार, जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन करने पर रोक लगाते हुए दिल्ली में विरोध प्रदर्शन और सभाओं के लिए रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली स्थित सीबीडी ग्राउंड को निर्धारित किए जाने की बात कही गई है।
बताया गया है कि यह बदलाव 28 अप्रैल 2022 को जारी पुराने स्टैंडिंग ऑर्डर में आंशिक संशोधन करके किया गया है। इन स्थानों पर प्रदर्शनों के संचालन के लिए अलग से विस्तृत नियम और मानक संचालन प्रक्रिया जारी किए जाने की बात भी सामने आई है। प्रशासन की ओर से सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को ऐसे फैसलों का आधार बताया जाता है। राष्ट्रीय राजधानी में सुरक्षा बनाए रखना निश्चित रूप से सरकार और पुलिस की जिम्मेदारी है, लेकिन इसके साथ यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि क्या सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए किसी ऐतिहासिक विरोध स्थल को पूरी तरह प्रतिबंधित करना आवश्यक है? जंतर-मंतर दिल्ली की उन जगहों में शामिल रहा है, जिन्होंने दशकों से देश के जनआंदोलनों की आवाज को अपने भीतर समेटा है। यहां केवल नारे नहीं गूंजे, बल्कि उन लोगों की पीड़ा भी सामने आई, जिनकी समस्याएं सरकारी फाइलों में उलझकर रह गई थीं। यहां बेरोजगार युवाओं ने रोजगार मांगा, किसानों ने अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाई, सामाजिक संगठनों ने न्याय की मांग की और आम नागरिकों ने व्यवस्था के सामने अपनी शिकायतें रखीं। इस स्थान ने अनेक आंदोलनों को राष्ट्रीय चर्चा का विषय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जंतर-मंतर की पहचान किसी एक राजनीतिक विचारधारा या संगठन तक सीमित नहीं रही। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यही रही कि अलग-अलग विचारों और मांगों वाले लोगों को यहां अपनी बात रखने का अवसर मिलता रहा। यही कारण है कि यह स्थान धीरे-धीरे केवल दिल्ली का एक भौगोलिक स्थल नहीं, बल्कि जनभावनाओं और लोकतांत्रिक असहमति का प्रतीक बन गया। किसी भी लोकतंत्र में विरोध का महत्व इसलिए है, क्योंकि सरकार और जनता के बीच संवाद हमेशा सहज नहीं होता। चुनाव के समय जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है, लेकिन लोकतांत्रिक जिम्मेदारी केवल मतदान तक समाप्त नहीं हो जाती। सरकार बनने के बाद भी नागरिकों को अपनी समस्याओं के समाधान की मांग करने, नीतियों पर सवाल उठाने और निर्णयों से असहमति व्यक्त करने का अधिकार बना रहता है। लोकतंत्र में जनता केवल सरकार चुनने वाली शक्ति नहीं, बल्कि सरकार को जवाबदेह बनाए रखने वाली शक्ति भी है। यदि किसी नागरिक को लगता है कि उसकी शिकायत नहीं सुनी जा रही है, तो शांतिपूर्ण प्रदर्शन उसके लिए अपनी बात सार्वजनिक रूप से रखने का माध्यम बनता है। इसलिए विरोध को केवल अव्यवस्था या प्रशासनिक परेशानी के रूप में देखना लोकतंत्र की व्यापक भावना को सीमित करना होगा। यह भी सच है कि दिल्ली देश की राजधानी है और यहां सुरक्षा संबंधी चुनौतियां सामान्य शहरों की तुलना में अधिक जटिल हो सकती हैं।
संसद, केंद्रीय मंत्रालयों और महत्वपूर्ण सरकारी प्रतिष्ठानों की सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है। बड़े प्रदर्शनों के कारण यातायात प्रभावित हो सकता है और आम नागरिकों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। प्रशासन की यह जिम्मेदारी है कि सार्वजनिक व्यवस्था बनी रहे, आपातकालीन सेवाएं निर्बाध चलती रहें और किसी भी प्रदर्शन के दौरान हिंसा या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसी घटनाएं न हों। लेकिन लोकतंत्र में प्रशासनिक सुविधा और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करना भी उतना ही आवश्यक है। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर ऐसे कदम नहीं उठाए जाने चाहिए, जिनसे नागरिकों को अपने संवैधानिक अधिकारों का उपयोग करने में अनावश्यक कठिनाई का सामना करना पड़े। यदि जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों के कारण सुरक्षा या यातायात संबंधी समस्याएं उत्पन्न हो रही थीं, तो उनका समाधान बेहतर प्रबंधन, निर्धारित समयसीमा, स्पष्ट अनुमति प्रक्रिया और पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था के माध्यम से तलाशा जा सकता था। किसी स्थान पर समस्याएं होने का अर्थ यह नहीं कि उस स्थान से जुड़ी पूरी लोकतांत्रिक परंपरा को समाप्त कर दिया जाए। प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि इस निर्णय की आवश्यकता किन परिस्थितियों में महसूस की गई और क्या दूसरे विकल्पों पर गंभीरता से विचार किया गया।
किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय की स्वीकार्यता तभी बढ़ती है, जब उसके पीछे के कारण जनता के सामने पारदर्शी ढंग से रखे जाते हैं। लोकतंत्र में आदेश जारी करना प्रशासनिक प्रक्रिया है, लेकिन जनता का विश्वास अर्जित करना राजनीतिक और नैतिक जिम्मेदारी है। रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और सीबीडी ग्राउंड को प्रदर्शन के लिए निर्धारित करना अपने आप में अनुचित नहीं कहा जा सकता। बड़े मैदानों में भीड़ का प्रबंधन करना आसान हो सकता है और प्रशासन को सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने में सुविधा मिल सकती है। लेकिन केवल स्थान उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना होगा कि इन स्थानों तक पहुंचने के लिए सार्वजनिक परिवहन की सुविधा कैसी है, वहां बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हैं या नहीं और दूर-दराज से आने वाले लोगों के लिए प्रदर्शन में शामिल होना कितना व्यावहारिक है। लोकतांत्रिक अधिकार तभी प्रभावी होते हैं, जब उनका इस्तेमाल करना आम नागरिकों के लिए वास्तव में संभव हो। यदि विरोध स्थल ऐसी जगहों पर निर्धारित किए जाते हैं, जहां पहुंचना कठिन हो या जहां प्रदर्शन की आवाज व्यापक समाज तक पहुंचने में बाधाओं का सामना करे, तो केवल वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराने से उद्देश्य पूरा नहीं होगा।
जंतर-मंतर का महत्व इस बात में भी रहा है कि वह राष्ट्रीय राजधानी के ऐसे हिस्से में स्थित है, जहां होने वाले आंदोलनों पर मीडिया, जनप्रतिनिधियों और आम लोगों का ध्यान आसानी से जाता रहा है। किसी आंदोलन की ताकत केवल प्रदर्शनकारियों की संख्या में नहीं होती, बल्कि इस बात में भी होती है कि उनकी आवाज कितनी दूर तक पहुंचती है। जब कोई व्यक्ति अपने गांव या छोटे शहर से दिल्ली आता है, तो उसके पीछे केवल व्यक्तिगत परेशानी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था से जुड़ी उम्मीद होती है, जिसके माध्यम से उसकी समस्या का समाधान हो सकता है। ऐसे व्यक्ति के लिए प्रदर्शन स्थल तक पहुंचना, अपनी मांगों को सार्वजनिक करना और संबंधित अधिकारियों का ध्यान आकर्षित करना आंदोलन की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। इसलिए विरोध स्थल में बदलाव करते समय उसके व्यावहारिक और लोकतांत्रिक प्रभावों पर विचार करना आवश्यक है। इस फैसले पर सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके की प्रतिक्रिया भी इसी व्यापक चिंता को सामने लाती है। उन्होंने जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन के अधिकृत स्थल से हटाए जाने पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि अब विरोध के इस स्थल को युद्ध का मैदान बना दिया गया है और पूरा देश ही जंतर-मंतर बनेगा। इस बयान को राजनीतिक प्रतिक्रिया मानकर नजरअंदाज किया जा सकता है, लेकिन इसके भीतर छिपे संदेश को समझना जरूरी है। जब लोगों को लगता है कि उनकी आवाज के लिए उपलब्ध मंच सीमित किए जा रहे हैं, तो असंतोष किसी एक स्थान तक सीमित नहीं रहता। वह दूसरे शहरों, विश्वविद्यालयों, गांवों और सामाजिक संगठनों तक पहुंच सकता है। किसी विरोध स्थल की अनुमति समाप्त करने से वहां होने वाले प्रदर्शन रुक सकते हैं, लेकिन जिन समस्याओं को लेकर लोग प्रदर्शन करना चाहते हैं, वे अपने आप समाप्त नहीं हो जातीं। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना को सरकार के विरोध के रूप में देखना भी एक बड़ी भूल है। किसी नीति पर सवाल उठाना देश का विरोध करना नहीं है और किसी प्रशासनिक निर्णय से असहमति जताना व्यवस्था को कमजोर करना नहीं है।
कई बार आलोचना ही सरकार को अपनी कमियों को पहचानने और सुधार करने का अवसर देती है। जो व्यवस्था सवालों से डरती है, वह धीरे-धीरे संवाद की क्षमता खोने लगती है। इसके विपरीत, जो सरकार असहमति को सुनती है और आलोचना का उत्तर तथ्यों तथा तर्कों से देती है, वह जनता के बीच अपना विश्वास मजबूत कर सकती है। जनआंदोलन हमेशा सरकार के विरुद्ध नहीं होते; कई बार वे सरकार को उन वास्तविक समस्याओं की ओर ध्यान दिलाते हैं, जो प्रशासनिक व्यवस्था की सीमाओं के कारण सामने नहीं आ पातीं। भारतीय संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण तथा निरस्त्र सभा करने का अधिकार देता है। हालांकि, इन अधिकारों पर कानून के तहत उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, लेकिन किसी भी प्रतिबंध का उद्देश्य और उसका प्रभाव लोकतांत्रिक मूल्यों की कसौटी पर परखा जाना चाहिए।
नागरिकों की जिम्मेदारी है कि वे शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखें, कानून का पालन करें और दूसरे लोगों के अधिकारों का सम्मान करें। उसी प्रकार प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह कानून लागू करते समय निष्पक्षता बनाए रखे और नागरिकों को अपनी बात रखने का वास्तविक अवसर प्रदान करे। अधिकार और जिम्मेदारी के बीच यही संतुलन लोकतंत्र को मजबूत बनाता है। इस पूरे विषय पर एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि क्या ऐसे निर्णयों से पहले उन लोगों के साथ पर्याप्त संवाद किया जाता है, जिनके जीवन और अधिकारों पर उनका सीधा प्रभाव पड़ता है? यदि किसी ऐतिहासिक विरोध स्थल को हटाने का निर्णय लिया गया है, तो उसके कारणों को सार्वजनिक करना, संबंधित संगठनों की आपत्तियां सुनना और वैकल्पिक व्यवस्था को प्रभावी बनाना आवश्यक है। नए प्रदर्शन स्थलों पर अनुमति की प्रक्रिया सरल, पारदर्शी और निष्पक्ष होनी चाहिए। किसी संगठन या विचारधारा के आधार पर भेदभाव की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।
यदि किसी प्रदर्शन को अनुमति देने से इनकार किया जाता है, तो उसके पीछे स्पष्ट कारण होने चाहिए और संबंधित पक्ष को उचित प्रक्रिया के तहत अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए। लोकतंत्र में प्रशासनिक व्यवस्था जितनी पारदर्शी होगी, जनता का विश्वास उतना ही मजबूत होगा। आज देश के सामने असली चुनौती यह नहीं है कि विरोध कहां हो, बल्कि यह है कि विरोध करने वालों की आवाज कितनी गंभीरता से सुनी जाए। किसी भी सरकार के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन को केवल प्रबंधन की समस्या समझना पर्याप्त नहीं है। उसके पीछे छिपे असंतोष को समझना और उसके समाधान का प्रयास करना भी जरूरी है। यदि कोई नौजवान रोजगार की मांग कर रहा है, तो उसकी आवाज को केवल भीड़ का हिस्सा मानकर नहीं देखा जाना चाहिए। यदि किसान अपनी समस्याओं को लेकर राजधानी पहुंचता है, तो उसकी मांगों पर विचार करना चाहिए। यदि कोई सामाजिक संगठन न्याय की मांग करता है, तो उसकी शिकायतों को तथ्यों के आधार पर परखना चाहिए। लोकतंत्र का उद्देश्य असहमति को समाप्त करना नहीं, बल्कि उसे संवाद और समाधान की प्रक्रिया में शामिल करना है।
जंतर-मंतर से जुड़ा यह विवाद हमें एक बुनियादी बात याद दिलाता है कि लोकतंत्र केवल संसद और विधानसभाओं तक सीमित नहीं होता। वह उन सड़कों और मैदानों में भी जीवित रहता है, जहां आम नागरिक अपनी बात कहने के लिए एकत्र होते हैं। लोकतंत्र की मजबूती का प्रमाण यह नहीं है कि देश में विरोध प्रदर्शन कम हो गए हैं, बल्कि यह है कि नागरिकों को अपनी समस्याएं रखने के लिए शांतिपूर्ण और प्रभावी मंच उपलब्ध हैं। किसी भी सरकार को यह समझना चाहिए कि जनता की चुप्पी हमेशा संतुष्टि का संकेत नहीं होती। कभी-कभी वह निराशा का परिणाम भी होती है। इसलिए विरोध की आवाज सुनना केवल नागरिकों पर किया गया उपकार नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक शासन की अनिवार्य जिम्मेदारी है। अंततः जंतर-मंतर पर प्रतिबंध और नए प्रदर्शन स्थलों के निर्धारण का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि इससे सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने के साथ-साथ नागरिकों के अधिकार कितने सुरक्षित रहते हैं। यदि नए स्थानों पर लोगों को अपनी बात रखने की समान स्वतंत्रता, सुगम पहुंच और प्रभावी सार्वजनिक मंच मिलता है, तो प्रशासन अपनी व्यवस्था को बेहतर बना सकता है।
लेकिन यदि इस बदलाव से प्रदर्शन करना अधिक कठिन हो जाता है या नागरिकों की आवाज सत्ता के गलियारों तक पहुंचने में बाधाओं का सामना करती है, तो इस निर्णय पर पुनर्विचार की मांग स्वाभाविक होगी। जंतर-मंतर की असली पहचान वहां की जमीन से अधिक उन आवाजों में रही है, जो उस जमीन पर खड़े होकर न्याय की मांग करती रही हैं। स्थान बदले जा सकते हैं, नियम बनाए जा सकते हैं और प्रशासनिक व्यवस्थाओं में संशोधन किया जा सकता है, लेकिन लोकतंत्र की आत्मा को केवल आदेशों से नियंत्रित नहीं किया जा सकता। एक जीवंत लोकतंत्र वही है, जहां सत्ता को सवाल सुनने का साहस हो और नागरिकों को अपनी बात कहने का भरोसा। क्योंकि लोकतंत्र की असली परीक्षा इस बात में नहीं है कि सरकार अपने समर्थकों को कितना सुनती है, बल्कि इस बात में है कि वह अपने आलोचकों की आवाज के लिए कितनी जगह छोड़ती है। जंतर-मंतर का सवाल आखिरकार इसी लोकतांत्रिक कसौटी का सवाल है।
