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गिरिडीह उपचुनाव में किसका पलड़ा भारी? सहानुभूति, सियासी प्रतिष्ठा और जेएलकेएम के वोटों के बीच फंसा मुकाबला

गिरिडीह उपचुनाव में झामुमो, भाजपा और जेएलकेएम के बीच मुकाबला दिलचस्प होने की संभावना है।

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गिरिडीह उपचुनाव में किसका पलड़ा भारी? सहानुभूति, सियासी प्रतिष्ठा और जेएलकेएम के वोटों के बीच फंसा मुकाबला

 

दिवंगत विधायक सुदिव्य कुमार सोनू की विरासत बचाने में जुटेगा झामुमो, खोई हुई जमीन वापस पाने की कोशिश करेगी भाजपा, तीसरी ताकत के रूप में जेएलकेएम बिगाड़ सकता है दोनों दलों का गणित

 

संपादकीय-

डॉ. साकेत कुमार पाठक 

 

झारखंड की राजनीति में गिरिडीह विधानसभा उपचुनाव एक बार फिर सियासी ताकत, जनसमर्थन और चुनावी रणनीति की परीक्षा लेने जा रहा है। यह चुनाव केवल एक विधानसभा सीट पर नए विधायक के चयन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसके परिणाम से झारखंड मुक्ति मोर्चा और भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक स्थिति को लेकर भी कई संकेत मिल सकते हैं। दिवंगत विधायक सुदिव्य कुमार सोनू के निधन के बाद रिक्त हुई इस सीट पर झामुमो के सामने अपनी राजनीतिक विरासत को बचाने की चुनौती है, तो भाजपा के लिए यह पिछले चुनाव में मिली हार का बदला लेने और गिरिडीह में अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने का अवसर है। इन दोनों प्रमुख दलों के बीच झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा की मौजूदगी मुकाबले को और दिलचस्प बना रही है। वर्ष 2024 के विधानसभा चुनाव में जेएलकेएम को मिले 10,787 मतों ने यह संकेत दिया था कि गिरिडीह में चुनावी राजनीति केवल दो दलों के इर्द-गिर्द नहीं घूमती। यही वजह है कि इस बार सभी प्रमुख राजनीतिक दलों की निगाहें जेएलकेएम के प्रदर्शन और उसके समर्थकों के रुख पर टिकी रहेंगी।

डॉ. साकेत कुमार पाठक ज्योतिषाचार्य सह शिक्षाविद्
डॉ. साकेत कुमार पाठक
ज्योतिषाचार्य सह शिक्षाविद्

 

गिरिडीह की राजनीतिक परिस्थितियों को समझने के लिए पिछले विधानसभा चुनाव के परिणामों पर नजर डालना जरूरी है। वर्ष 2024 में झामुमो के सुदिव्य कुमार सोनू ने भाजपा के निर्भय कुमार शाहाबादी को 3,838 मतों से पराजित किया था। सोनू को 94,042 मत प्राप्त हुए थे, जबकि जेएलकेएम के उम्मीदवार ने 10,787 मत हासिल किए थे। दोनों प्रमुख दलों के बीच जीत का अंतर सीमित रहने और तीसरे दल को दस हजार से अधिक मत मिलने के कारण इस सीट का चुनावी गणित काफी महत्वपूर्ण हो गया था। हालांकि, पिछले चुनाव के आंकड़ों को इस बार के परिणाम का सीधा आधार नहीं माना जा सकता, लेकिन वे यह जरूर बताते हैं कि गिरिडीह में मतों का मामूली बदलाव भी राजनीतिक तस्वीर बदलने की क्षमता रखता है। झामुमो के लिए इस उपचुनाव का सबसे बड़ा भावनात्मक और राजनीतिक पक्ष सुदिव्य कुमार सोनू की विरासत है।

 

 

किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि के निधन के बाद होने वाले चुनाव में मतदाताओं की सहानुभूति अक्सर महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि दिवंगत विधायक का जनता के साथ व्यक्तिगत जुड़ाव रहा हो और उनके कार्यों को लेकर सकारात्मक धारणा बनी हो, तो इसका लाभ उनके परिवार या उनकी पार्टी को मिल सकता है। झामुमो इसी संभावना को अपनी चुनावी ताकत में बदलने की कोशिश करेगा। सुदिव्य कुमार सोनू की पत्नी श्वेता शर्मा को संभावित उम्मीदवार बनाए जाने की चर्चा भी इसी राजनीतिक संदर्भ में महत्वपूर्ण है। उनके द्वारा दिवंगत विधायक के अधूरे सपनों को पूरा करने की बात कहना भावनात्मक रूप से मतदाताओं से जुड़ने का प्रयास माना जा सकता है।लेकिन राजनीति में सहानुभूति की अपनी सीमाएं भी होती हैं। मतदाता किसी नेता के प्रति सम्मान और संवेदना रखने के बावजूद अपने क्षेत्र के विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय समस्याओं के आधार पर निर्णय ले सकते हैं। इसलिए झामुमो के लिए केवल दिवंगत विधायक की विरासत का उल्लेख करना पर्याप्त नहीं होगा।

 

पार्टी को यह भी बताना होगा कि गिरिडीह की जनता की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए उसके पास क्या योजना है। यदि श्वेता शर्मा को उम्मीदवार बनाया जाता है, तो उनके सामने व्यक्तिगत भावनात्मक जुड़ाव को राजनीतिक विश्वास में बदलने की चुनौती होगी। उन्हें यह साबित करना होगा कि वह केवल दिवंगत विधायक की राजनीतिक विरासत की प्रतिनिधि नहीं, बल्कि क्षेत्र की समस्याओं को समझने और उनके समाधान के लिए प्रभावी भूमिका निभाने में भी सक्षम हैं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन के लिए भी यह उपचुनाव राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा सकता है। झामुमो यदि गिरिडीह की सीट बचाने में सफल रहता है, तो इसे पार्टी के जनाधार और नेतृत्व के प्रति भरोसे के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। इसके विपरीत, यदि पार्टी को अपेक्षा के अनुरूप समर्थन नहीं मिलता, तो विपक्ष को राज्य सरकार और सत्तारूढ़ दल की राजनीतिक स्थिति पर सवाल उठाने का अवसर मिल सकता है। हालांकि, किसी एक उपचुनाव के परिणाम को पूरे राज्य की राजनीतिक परिस्थितियों का निर्णायक प्रमाण मानना उचित नहीं होगा, क्योंकि उपचुनाव में स्थानीय समीकरण, उम्मीदवार की स्वीकार्यता और विशेष परिस्थितियां महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। भारतीय जनता पार्टी के लिए गिरिडीह का मुकाबला किसी भी दृष्टि से आसान नहीं माना जा सकता।

 

वर्ष 2024 में कम अंतर से मिली हार के बाद पार्टी के पास अपनी रणनीति में सुधार करने और मतदाताओं के बीच नए सिरे से विश्वास कायम करने का अवसर है। भाजपा के सामने सबसे पहली चुनौती ऐसे उम्मीदवार का चयन करना होगा, जो न केवल पार्टी के परंपरागत समर्थकों के बीच स्वीकार्य हो, बल्कि व्यापक मतदाता वर्ग को भी आकर्षित कर सके। पूर्व विधायक निर्भय कुमार शाहाबादी के साथ रवींद्र राय समेत अन्य संभावित नामों की चर्चा के बीच पार्टी को संगठनात्मक समीकरणों और स्थानीय जनभावनाओं का संतुलन साधना होगा।भाजपा के प्रदेश महामंत्री अमर बाउरी के अनुसार, पार्टी गिरिडीह उपचुनाव में अपना उम्मीदवार उतारेगी और चुनाव की तैयारी शुरू कर दी गई है। उम्मीदवार के नाम पर केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक में चर्चा होने के बाद घोषणा की जाएगी। यह स्पष्ट है कि पार्टी इस सीट को गंभीरता से ले रही है। लेकिन केवल उम्मीदवार घोषित कर देना या चुनावी तैयारियों का दावा करना जीत की गारंटी नहीं है।

 

भाजपा को पिछले चुनाव में मिली हार के कारणों का आकलन करना होगा। उसे यह समझना होगा कि किन क्षेत्रों में मतदाताओं का अपेक्षित समर्थन नहीं मिला और किन मुद्दों पर झामुमो ने बढ़त बनाई। चुनावी सफलता के लिए पार्टी को स्थानीय समस्याओं पर स्पष्ट दृष्टिकोण प्रस्तुत करने के साथ-साथ अपने कार्यकर्ताओं को एकजुट रखना होगा। गिरिडीह उपचुनाव में झामुमो और भाजपा के बीच होने वाले मुकाबले को प्रभावित करने वाला तीसरा महत्वपूर्ण पक्ष जेएलकेएम है। जयराम महतो के नेतृत्व वाले इस संगठन ने पिछले विधानसभा चुनाव में 10,787 मत प्राप्त कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी। इस बार भी पार्टी ने पूरी ताकत के साथ चुनाव लड़ने की बात कही है। जेएलकेएम के केंद्रीय अध्यक्ष जयराम महतो का कहना है कि पंचायत स्तर तक कार्यकर्ताओं से संपर्क साधा जा रहा है और संगठन को मजबूत करने के साथ चुनावी रणनीति तैयार की जा रही है। उनका दावा है कि पार्टी इस बार गिरिडीह में अपनी मजबूत पहचान छोड़ेगी। यह दावा कितना प्रभावी साबित होगा, इसका पता चुनाव प्रचार के दौरान संगठन की सक्रियता और मतदाताओं के रुझान से चलेगा। जेएलकेएम की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि पिछले चुनाव में उसे मिले मतों की संख्या दोनों प्रमुख दलों के बीच जीत के अंतर से काफी अधिक थी।

 

लेकिन यह मान लेना राजनीतिक भूल होगी कि जेएलकेएम के मतदाता एकमुश्त किसी एक दल की ओर चले जाएंगे या उनके मतों के आधार पर चुनाव का परिणाम पहले से तय किया जा सकता है। पिछले चुनाव में किसी दल को समर्थन देने वाले मतदाता इस बार भी उसी दल के साथ रह सकते हैं, किसी दूसरे उम्मीदवार को चुन सकते हैं अथवा मतदान से दूरी बना सकते हैं। चुनावी राजनीति में मतों का हस्तांतरण स्वतः नहीं होता। इसके लिए राजनीतिक विश्वास, स्थानीय नेतृत्व और मतदाताओं के हितों का मेल आवश्यक होता है। इसलिए जेएलकेएम के सामने अपनी पुरानी उपलब्धि को दोहराने के साथ-साथ नए मतदाताओं को जोड़ने की चुनौती भी होगी। जयराम महतो के लिए गिरिडीह उपचुनाव अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता साबित करने का अवसर बन सकता है। यदि जेएलकेएम प्रभावी प्रदर्शन करता है, तो राज्य की राजनीति में उसकी भूमिका को लेकर चर्चा और तेज होगी। इसके विपरीत, यदि पार्टी अपने पिछले मताधार को बनाए रखने में असफल रहती है, तो उसके संगठनात्मक विस्तार और राजनीतिक प्रभाव को लेकर सवाल उठ सकते हैं। इस चुनाव में जेएलकेएम की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जाएगी कि वह कितने मत प्राप्त करता है, बल्कि इस बात से भी आंकी जाएगी कि वह अपने समर्थकों को कितनी मजबूती से अपने साथ बनाए रख पाता है।

 

क्षेत्रीय मुद्दों को लेकर उसकी स्पष्टता और चुनावी मैदान में उसके उम्मीदवार की स्वीकार्यता भी महत्वपूर्ण होगी। इस पूरे राजनीतिक मुकाबले में भाजपा और आजसू पार्टी के बीच तालमेल का सवाल भी अहम है। आजसू की रणनीति और गिरिडीह के सांसद चंद्रप्रकाश चौधरी की सक्रियता को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा है। 11 अक्टूबर को पीरटांड़ के जमुआ मैदान में आयोजित जनसंवाद और कार्यकर्ता सम्मेलन ने क्षेत्र में आजसू की सक्रियता को सामने रखा था। यदि भाजपा और आजसू के बीच प्रभावी समन्वय स्थापित होता है, तो इसका लाभ चुनावी अभियान में मिल सकता है। लेकिन गठबंधन की सफलता केवल नेताओं के बयानों से सुनिश्चित नहीं होती। इसके लिए जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का तालमेल, साझा उम्मीदवार के प्रति स्वीकार्यता और मतदाताओं तक एक समान राजनीतिक संदेश पहुंचाना आवश्यक होता है।

 

यदि स्थानीय स्तर पर दोनों दलों के बीच समन्वय कमजोर रहा, तो गठबंधन की संभावित ताकत का पूरा लाभ नहीं मिल सकेगा। हालांकि, गिरिडीह उपचुनाव को केवल सहानुभूति, उम्मीदवारों की दावेदारी और दलों के बीच मतों के गणित तक सीमित कर देना लोकतांत्रिक दृष्टि से उचित नहीं होगा। चुनाव का वास्तविक महत्व इस बात में है कि राजनीतिक दल जनता के सवालों को कितनी गंभीरता से उठाते हैं। गिरिडीह के युवाओं के लिए रोजगार के अवसर, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, सड़क और परिवहन व्यवस्था, पेयजल की उपलब्धता तथा स्थानीय स्तर पर विकास की गति जैसे मुद्दे चुनावी विमर्श के केंद्र में होने चाहिए। मतदाताओं को यह जानने का अधिकार है कि चुनाव लड़ने वाले दल और उम्मीदवार इन समस्याओं के समाधान के लिए क्या दृष्टिकोण रखते हैं। केवल आरोप-प्रत्यारोप और भावनात्मक नारों से क्षेत्र की वास्तविक समस्याओं का समाधान संभव नहीं है झामुमो को दिवंगत विधायक के कार्यों और विकास की योजनाओं को आगे बढ़ाने का स्पष्ट खाका प्रस्तुत करना होगा।

 

भाजपा को यह बताना होगा कि वह क्षेत्र के लिए किस तरह की वैकल्पिक विकास नीति लेकर आएगी। जेएलकेएम को भी अपनी राजनीतिक पहचान के साथ-साथ ठोस जनहितकारी मुद्दों पर अपनी प्रतिबद्धता स्पष्ट करनी होगी। लोकतंत्र में किसी दल की वास्तविक ताकत केवल चुनावी मंचों पर भीड़ जुटाने या राजनीतिक दावे करने से तय नहीं होती, बल्कि जनता के बीच उसके विश्वास और समस्याओं के समाधान की क्षमता से निर्धारित होती है।

गिरिडीह विधानसभा उपचुनाव में फिलहाल तीन अलग-अलग राजनीतिक संभावनाएं दिखाई देती हैं। झामुमो सहानुभूति और राजनीतिक विरासत के सहारे अपनी सीट बचाने की कोशिश करेगा। भाजपा संगठनात्मक मजबूती, उम्मीदवार के चयन और गठबंधन के तालमेल के जरिए वापसी का रास्ता तलाशेगी। वहीं, जेएलकेएम अपने पिछले प्रदर्शन को आधार बनाकर दोनों प्रमुख दलों के सामने नई चुनौती खड़ी करने की कोशिश करेगा। इनमें से कौन-सी रणनीति मतदाताओं को अधिक प्रभावित करेगी, इसका फैसला चुनाव के दौरान बने माहौल और मतदान के दिन जनता के रुख से होगा। गिरिडीह का चुनावी परिणाम केवल एक सीट की जीत-हार नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों के लिए जनविश्वास की परीक्षा भी होगा। सुदिव्य कुमार सोनू के प्रति सहानुभूति झामुमो के पक्ष में माहौल बना सकती है, भाजपा की वापसी की कोशिश मुकाबले को कड़ा कर सकती है और जेएलकेएम के मत चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं।

 

लेकिन इनमें से कोई भी परिस्थिति अपने आप में जीत की गारंटी नहीं है। मतदाता राजनीतिक दावों, भावनात्मक अपीलों और गठबंधन के गणित से आगे बढ़कर अपने विवेक से निर्णय लेने की क्षमता रखते हैं। लोकतंत्र की असली ताकत भी इसी में है। गिरिडीह की जनता जिस दल को अपना समर्थन देगी, उसके सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी चुनावी वादों को पूरा करने और क्षेत्र के विकास को प्राथमिकता देने की होगी। यही इस उपचुनाव की सबसे बड़ी कसौटी और लोकतांत्रिक राजनीति की वास्तविक सफलता होगी।

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राज्य प्रभारी
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हंसराज चौरसिया स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार एवं मीडिया कम्युनिकेशन से जुड़े पेशेवर हैं। वर्ष 2017 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हंसराज ने अपने करियर की शुरुआत स्वतंत्र प्रभात से की। बीते वर्षों में उन्होंने झारखंड के सामाजिक, राजनीतिक और जनसरोकार से जुड़े विषयों पर निरंतर लेखन, रिपोर्टिंग और ग्राउंड कवरेज किया है।उन्होंने विभिन्न चुनावों की प्रत्यक्ष एवं जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए चुनावी माहौल, जनमत, स्थानीय मुद्दों, राजनीतिक गतिविधियों और मतदाताओं के बीच जाकर रिपोर्टिंग का अनुभव हासिल किया है। क्षेत्रीय राजनीति और जनसरोकार के मुद्दों पर उनकी रिपोर्टिंग में स्थानीय परिस्थितियों और प्रत्यक्ष अनुभवों को विशेष महत्व मिलता है। वर्तमान में वे झारखंड दर्शन, खबर मन्त्र, स्वतंत्र प्रभात, अमर भास्कर, झारखंड न्यूज़24 एवं क्राफ्ट समाचार सहित विभिन्न मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए स्वतंत्र लेखन एवं रिपोर्टिंग कर रहे हैं। साथ ही झारखंड न्यूज़24 में राज्य प्रभारी के रूप में संपादकीय एवं संगठनात्मक जिम्मेदारी निभा रहे हैं। उनकी पत्रकारिता का प्रमुख फोकस जमीनी मुद्दे, सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिक विमर्श, आदिवासी समाज, राजनीति और जनहित से जुड़े विषयों पर रहा है। राजनीतिक संवाद एवं मीडिया कम्युनिकेशन के क्षेत्र में भी उन्हें व्यावहारिक अनुभव प्राप्त है। शैक्षणिक रूप से हंसराज वर्तमान में रांची विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर (2024–26) कर रहे हैं। साहित्यिक अध्ययन और पत्रकारिता के व्यावहारिक अनुभव का समन्वय उनके लेखन को विषयगत समझ, सामाजिक संवेदना और प्रभावी भाषा प्रदान करता है। हजारीबाग के बरगड्डा गांव से आने वाले हंसराज वर्तमान में रांची में रहते हैं और स्वतंत्र पत्रकारिता के माध्यम से झारखंड के सामाजिक, राजनीतिक एवं जनसरोकार से जुड़े विषयों को व्यापक विमर्श तक पहुंचाने के लिए सक्रिय हैं।
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