करवा चौथ: आस्था और प्रेम का पर्व, रिश्तों की मजबूती का संदेश
29 अक्टूबर को मनाया जाएगा करवा चौथ, चांद के दीदार के साथ पूरी होगी व्रत रखने वाली महिलाओं की प्रतीक्षा, बदलते दौर में परंपरा, विश्वास और दांपत्य जीवन के मूल्यों पर विचार करने का अवसर
संपादकीय-
डॉ. साकेत कुमार पाठक
भारत की सांस्कृतिक परंपराओं में त्योहार केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं होते, बल्कि वे समाज की भावनाओं, पारिवारिक संबंधों और जीवन मूल्यों को भी अभिव्यक्त करते हैं। भारतीय जनजीवन में अनेक पर्व ऐसे हैं, जिनकी पहचान आस्था के साथ-साथ प्रेम, समर्पण और सामाजिक एकजुटता से जुड़ी हुई है। करवा चौथ भी ऐसा ही एक पर्व है, जिसका इंतजार विवाहित महिलाएं विशेष उत्साह और श्रद्धा के साथ करती हैं। वर्ष 2026 में करवा चौथ का पर्व 29 अक्टूबर, गुरुवार को मनाया जाएगा। इस अवसर पर महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी दांपत्य जीवन की कामना करते हुए व्रत रखती हैं। दिनभर उपवास, पूजा-अर्चना और चंद्रमा के दर्शन के बाद व्रत खोलने की परंपरा इस त्योहार को विशिष्ट बनाती है।

ज्योतिषाचार्य सह शिक्षाविद्
हालांकि, करवा चौथ का वास्तविक महत्व केवल धार्मिक मान्यताओं और पारंपरिक रस्मों में नहीं, बल्कि उन भावनाओं में भी निहित है, जो पति-पत्नी के रिश्ते को प्रेम, विश्वास और जिम्मेदारी के सूत्र में बांधती हैं। करवा चौथ का पर्व भारतीय समाज में लंबे समय से प्रचलित है। विशेष रूप से उत्तर भारत के राज्यों में इसे व्यापक उत्साह के साथ मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और मध्य प्रदेश सहित देश के विभिन्न हिस्सों में महिलाएं इस दिन परंपरागत तरीके से पूजा करती हैं। स्थानीय रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा की विधियों और लोककथाओं में अंतर हो सकता है, लेकिन पर्व की मूल भावना दांपत्य जीवन की मंगलकामना और परिवार की सुख-समृद्धि से जुड़ी रहती है। महिलाएं सुबह से ही व्रत की तैयारियों में जुट जाती हैं।
घरों में पूजा की व्यवस्था की जाती है, बाजारों में रौनक बढ़ जाती है और मेहंदी, चूड़ियों, साड़ियों तथा शृंगार सामग्री की दुकानों पर भीड़ दिखाई देने लगती है। शाम होते-होते पूजा की थालियां सजती हैं और चंद्रमा के उदय होने की प्रतीक्षा शुरू हो जाती है। चांद दिखाई देने पर महिलाएं पूजा-अर्चना करती हैं और परंपरा के अनुसार व्रत का पारण करती हैं। यह दृश्य भारतीय संस्कृति में आस्था और भावनात्मक जुड़ाव की एक परिचित तस्वीर प्रस्तुत करता है। लेकिन किसी भी त्योहार का महत्व केवल उसकी परंपराओं के निर्वहन से निर्धारित नहीं होता, बल्कि इस बात से भी तय होता है कि वह समाज को क्या संदेश देता है। करवा चौथ के संदर्भ में यह समझना आवश्यक है कि विवाह केवल सामाजिक संस्था या धार्मिक संस्कार नहीं, बल्कि दो व्यक्तियों के बीच जीवनभर निभाई जाने वाली साझेदारी है। इस साझेदारी की मजबूती प्रेम, विश्वास, सम्मान और आपसी सहयोग पर निर्भर करती है। पत्नी का अपने पति की लंबी आयु के लिए व्रत रखना उसकी आस्था और भावनात्मक जुड़ाव की अभिव्यक्ति है।
इसी प्रकार पति का भी यह दायित्व है कि वह पत्नी के स्वास्थ्य, भावनाओं, इच्छाओं और सम्मान का पूरा ध्यान रखे। यदि एक पक्ष अपने जीवनसाथी के लिए त्याग और समर्पण की भावना रखता है, तो दूसरे पक्ष से भी समान संवेदनशीलता और जिम्मेदारी की अपेक्षा स्वाभाविक है। किसी रिश्ते की सार्थकता एकतरफा समर्पण में नहीं, बल्कि परस्पर सम्मान और सहभागिता में निहित होती है। समय के साथ करवा चौथ मनाने के तौर-तरीकों में बदलाव आया है। पहले यह पर्व मुख्य रूप से पारिवारिक परंपराओं और सामुदायिक सहभागिता के बीच मनाया जाता था, लेकिन अब शहरीकरण, बदलती जीवनशैली, टेलीविजन और सोशल मीडिया ने इसे नया स्वरूप दिया है। आज बाजारों में करवा चौथ की खरीदारी को लेकर विशेष उत्साह दिखाई देता है। महिलाएं नए परिधान, आभूषण और शृंगार सामग्री खरीदती हैं। कई स्थानों पर सामूहिक पूजा और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। सोशल मीडिया पर शुभकामना संदेशों और तस्वीरों के माध्यम से भी पर्व की खुशियां साझा की जाती हैं। इस बदलाव का सकारात्मक पक्ष यह है कि त्योहार लोगों को अपनी परंपराओं से जोड़ने के साथ स्थानीय व्यापार और छोटे कारोबारियों को आर्थिक अवसर भी प्रदान करता है।
मेहंदी लगाने वाले कलाकारों, वस्त्र विक्रेताओं, आभूषण कारोबारियों और पूजा सामग्री बेचने वाले दुकानदारों के लिए यह समय विशेष महत्व रखता है। हालांकि, त्योहारों के बढ़ते व्यावसायीकरण के बीच यह सवाल भी उठता है कि कहीं उनकी मूल भावना दिखावे की प्रतिस्पर्धा में तो नहीं खो रही है। महंगे उपहार, आकर्षक परिधान और सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा करने की होड़ कई बार त्योहार के वास्तविक उद्देश्य पर हावी होती दिखाई देती है। प्रेम और विश्वास का मूल्य किसी उपहार की कीमत या किसी तस्वीर की लोकप्रियता से तय नहीं किया जा सकता। रिश्तों की मजबूती इस बात से सामने आती है कि कठिन समय में जीवनसाथी एक-दूसरे के साथ कितना खड़ा रहता है। घर की जिम्मेदारियों को साझा करना, एक-दूसरे की बात सुनना, आर्थिक निर्णयों में सहभागिता देना और विपरीत परिस्थितियों में सहयोग करना दांपत्य जीवन की ऐसी आवश्यकताएं हैं, जिनका महत्व किसी एक दिन के उत्सव से कहीं अधिक है। करवा चौथ की परंपरा तभी अधिक सार्थक होगी, जब पर्व के दिन व्यक्त किया जाने वाला प्रेम पूरे वर्ष व्यवहार में भी दिखाई दे। इस पर्व के संदर्भ में महिलाओं के स्वास्थ्य और उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर विचार करना भी आवश्यक है।
परंपरागत रूप से करवा चौथ का व्रत निर्जला रखा जाता है, लेकिन हर व्यक्ति की शारीरिक स्थिति एक जैसी नहीं होती। कुछ महिलाओं को स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हो सकती हैं, जबकि गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और नियमित दवा लेने वालों के लिए लंबे समय तक भोजन और पानी से दूर रहना कठिन हो सकता है। ऐसे में धार्मिक आस्था के साथ स्वास्थ्य के प्रति जिम्मेदारी को भी महत्व दिया जाना चाहिए। किसी भी परंपरा का उद्देश्य व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता और संतोष लाना होना चाहिए, न कि उसे शारीरिक परेशानी या सामाजिक दबाव में डालना। व्रत रखना व्यक्तिगत आस्था का विषय है और इसे स्वेच्छा, समझदारी तथा अपनी स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखकर निभाया जाना चाहिए। परिवार के सदस्यों को भी इस दौरान महिलाओं की सुविधा और जरूरतों का ध्यान रखना चाहिए। प्रेम का अर्थ किसी व्यक्ति से उसकी क्षमता से अधिक त्याग की अपेक्षा करना नहीं, बल्कि उसकी परिस्थितियों को समझना है।
बदलते सामाजिक परिवेश में करवा चौथ की परंपरा को लेकर नई पीढ़ी के बीच भी अलग-अलग विचार दिखाई देते हैं। कुछ लोग इसे भारतीय संस्कृति और वैवाहिक समर्पण का महत्वपूर्ण प्रतीक मानते हैं, जबकि कुछ लोग इसे परंपरागत लैंगिक भूमिकाओं से जोड़कर देखते हैं। इस विषय पर समाज को टकराव के बजाय संवाद का रास्ता अपनाना चाहिए। भारतीय संस्कृति की विशेषता यह रही है कि उसने समय के साथ अनेक परंपराओं को नए अर्थ दिए हैं। परंपरा का सम्मान करने का अर्थ यह नहीं है कि समाज में विचार और बदलाव की संभावनाओं को समाप्त कर दिया जाए। यदि कोई महिला अपनी श्रद्धा और खुशी से व्रत रखती है, तो उसके निर्णय का सम्मान किया जाना चाहिए।
इसी तरह यदि कोई महिला स्वास्थ्य, व्यक्तिगत विश्वास या अन्य कारणों से व्रत नहीं रखना चाहती, तो उसके निर्णय को भी सम्मान मिलना चाहिए। आस्था की सार्थकता तभी है, जब उसमें स्वेच्छा हो और वह किसी पर थोपी न जाए। आज के दौर में पति-पत्नी दोनों कामकाजी जीवन, आर्थिक दबाव, पारिवारिक जिम्मेदारियों और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच संतुलन बनाने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे समय में करवा चौथ को रिश्तों के भीतर संवाद और सहयोग बढ़ाने के अवसर के रूप में भी देखा जाना चाहिए। पति अपनी पत्नी की भावनाओं को समझें, उसकी मेहनत को पहचानें और घर-परिवार की जिम्मेदारियों में बराबर भागीदारी निभाएं। वहीं पत्नी भी अपने जीवनसाथी की परिस्थितियों, संघर्षों और भावनाओं को समझने का प्रयास करे। इसका अर्थ यह नहीं कि दोनों की भूमिका हमेशा एक जैसी होनी चाहिए, बल्कि यह कि दोनों के योगदान को समान सम्मान मिलना चाहिए। एक स्वस्थ दांपत्य संबंध वही है, जिसमें किसी एक व्यक्ति की इच्छाएं और जरूरतें लगातार दूसरे की अपेक्षाओं के पीछे दबती न रहें। करवा चौथ का सांस्कृतिक पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। इस पर्व के माध्यम से लोकगीतों, पारंपरिक वेशभूषा, पारिवारिक रीति-रिवाजों और पीढ़ियों से चली आ रही कहानियों को जीवित रखने का अवसर मिलता है। मां और दादी से सुनी गई कथाएं जब नई पीढ़ी तक पहुंचती हैं, तो परिवार की सांस्कृतिक स्मृतियां भी आगे बढ़ती हैं। हालांकि, बदलते समय में इन परंपराओं को केवल औपचारिकता के रूप में निभाने के बजाय उनके सामाजिक और मानवीय अर्थों को समझना अधिक आवश्यक है।
बच्चों को यह बताना जरूरी है कि त्योहारों का उद्देश्य केवल रीति-रिवाजों का पालन करना नहीं, बल्कि परिवार में प्रेम, सहयोग, संवेदनशीलता और सम्मान की भावना विकसित करना भी है। जब परंपराएं मानवीय मूल्यों से जुड़ती हैं, तभी वे आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रासंगिक बनी रहती हैं। करवा चौथ का पर्व भारतीय समाज को यह सोचने का अवसर देता है कि आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। बदलते समय के साथ जीवनशैली बदलना स्वाभाविक है, लेकिन रिश्तों की बुनियादी जरूरतें आज भी वही हैं। हर व्यक्ति चाहता है कि उसे समझा जाए, उसकी भावनाओं का सम्मान हो और कठिन परिस्थितियों में कोई उसके साथ खड़ा रहे। विवाह में यही भावनाएं विश्वास की नींव तैयार करती हैं। चंद्रमा के दर्शन और व्रत के पारण के साथ करवा चौथ का धार्मिक अनुष्ठान पूरा हो जाता है, लेकिन दांपत्य जीवन में प्रेम और जिम्मेदारी की परीक्षा प्रतिदिन होती है। यह परीक्षा किसी त्योहार या विशेष अवसर तक सीमित नहीं रहती, बल्कि रोजमर्रा के व्यवहार, संवाद और फैसलों में दिखाई देती है। करवा चौथ केवल चांद के निकलने की प्रतीक्षा का पर्व नहीं, बल्कि रिश्तों में विश्वास बनाए रखने और जीवनसाथी के प्रति जिम्मेदारी निभाने की याद दिलाने वाला अवसर भी है। 29 अक्टूबर को जब महिलाएं श्रद्धा के साथ पूजा करेंगी और चंद्रमा के दर्शन के बाद अपना व्रत खोलेंगी, तब इस पर्व की वास्तविक सार्थकता इसी बात में होगी कि उनके जीवन में प्रेम, सम्मान और सहयोग की भावना और मजबूत हो।
पति-पत्नी एक-दूसरे के स्वास्थ्य, सुख और सम्मान को समान महत्व दें, परिवार में संवाद बना रहे और किसी भी परंपरा का निर्वहन दबाव के बजाय स्वेच्छा से हो। त्योहारों की सुंदरता तभी कायम रहती है, जब वे जीवन को बेहतर बनाने का संदेश देते हैं। करवा चौथ का चांद हर वर्ष आकाश में दिखाई देता है, लेकिन उसके साथ जुड़ी प्रेम और विश्वास की रोशनी घर-परिवार के व्यवहार में भी बनी रहनी चाहिए। यही इस पर्व का व्यापक संदेश है और यही भारतीय पारिवारिक जीवन की सबसे बड़ी ताकत भी है।

