Ad image

31 अक्टूबर राष्ट्रीय एकता दिवस पर विशेष: सरदार पटेल की विरासत और अखंड भारत का संकल्प

सरदार पटेल ने 500 से अधिक देशी रियासतों का एकीकरण कर अखंड भारत की नींव मजबूत की। राष्ट्रीय एकता केवल भौगोलिक सीमाओं से नहीं, बल्कि सामाजिक सद्भाव, संवैधानिक मूल्यों, समानता और आपसी विश्वास से कायम होती है। 151वीं जयंती पर उनके आदर्शों को अपनाते हुए जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्रीय भेदभाव से ऊपर उठकर एक सशक्त, समावेशी और एकजुट भारत के निर्माण का संकल्प लेना समय की मांग है।

31 अक्टूबर राष्ट्रीय एकता दिवस पर विशेष
WhatsApp Group Join Now

31 अक्टूबर राष्ट्रीय एकता दिवस पर विशेष: सरदार पटेल की विरासत और अखंड भारत का संकल्प

 

एक राष्ट्र की शक्ति उसकी भौगोलिक सीमाओं से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के बीच कायम विश्वास, सद्भाव और एकजुटता से निर्धारित होती है

 

 

संपादकीय–

 

31 अक्टूबर केवल भारतीय इतिहास की एक तारीख नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना, अखंडता और सामूहिक संकल्प का स्मरण दिवस है। इसी दिन देश के प्रथम उपप्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती मनाई जाती है। वर्ष 2026 में उनकी 151वीं जयंती के अवसर पर पूरा देश राष्ट्रीय एकता दिवस के माध्यम से उस महान व्यक्तित्व के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करेगा, जिसने स्वतंत्रता के बाद बिखरे हुए भारत को एक राजनीतिक और प्रशासनिक इकाई के रूप में संगठित करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। यह अवसर केवल किसी महापुरुष की स्मृतियों को नमन करने का नहीं, बल्कि उन राष्ट्रीय आदर्शों की समीक्षा करने का भी है, जिनके आधार पर भारत की एकता और अखंडता की नींव रखी गई थी। इतिहास साक्षी है कि भारत की स्वतंत्रता जितनी बड़ी उपलब्धि थी, स्वतंत्रता के बाद राष्ट्र का एकीकरण उससे कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण कार्य था। अंग्रेजों की औपनिवेशिक सत्ता से मुक्ति के समय देश के सामने विभाजन की त्रासदी, सांप्रदायिक तनाव, विस्थापन, प्रशासनिक अव्यवस्था और सैकड़ों देशी रियासतों के भविष्य का प्रश्न खड़ा था। भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि सदियों की विविधताओं, अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं, भाषाओं, संस्कृतियों और क्षेत्रीय पहचानों को एक साझा राष्ट्रीय पहचान के सूत्र में कैसे पिरोया जाए। उस कठिन दौर में सरदार वल्लभभाई पटेल ने जिस दृढ़ इच्छाशक्ति, राजनीतिक दूरदर्शिता और असाधारण कूटनीतिक कौशल का परिचय दिया, उसने आधुनिक भारत के निर्माण की दिशा निर्धारित की।

डॉ. साकेत कुमार पाठक ज्योतिषाचार्य सह शिक्षाविद्
डॉ. साकेत कुमार पाठक
ज्योतिषाचार्य सह शिक्षाविद्

 

स्वतंत्रता के समय देश में 500 से अधिक देशी रियासतें थीं। इन रियासतों के भारत में विलय का प्रश्न नवगठित राष्ट्र के सामने एक गंभीर चुनौती बनकर उपस्थित था। यदि इन रियासतों का एकीकरण नहीं हो पाता, तो भारत का राजनीतिक नक्शा अनेक छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्यों में बंट सकता था। ऐसी स्थिति में राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक विकास, प्रशासनिक व्यवस्था और संप्रभुता सभी प्रभावित होते। सरदार पटेल ने तत्कालीन रियासत विभाग के सचिव वी.पी. मेनन के सहयोग से इस कठिन कार्य को असाधारण सूझबूझ और दृढ़ता के साथ आगे बढ़ाया। अधिकांश रियासतों को भारत संघ में सम्मिलित करने में सफलता मिली। हैदराबाद और जूनागढ़ जैसे जटिल मामलों का समाधान भी इसी व्यापक एकीकरण प्रक्रिया का हिस्सा था। कश्मीर का प्रश्न अपनी विशिष्ट ऐतिहासिक और राजनीतिक परिस्थितियों के कारण अलग रहा। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यदि सरदार पटेल ने उस समय निर्णायक नेतृत्व नहीं दिया होता, तो आज का भारत संभवतः वैसा नहीं होता, जैसा हम देखते हैं। उन्होंने केवल भौगोलिक सीमाओं को एक नहीं किया, बल्कि एक ऐसे राष्ट्र की आधारशिला रखी, जिसमें अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले, विभिन्न धर्मों को मानने वाले और विविध परंपराओं का पालन करने वाले लोग एक साझा संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत रह सकें। उनका राष्ट्रवाद किसी एक भाषा, धर्म, जाति अथवा क्षेत्र तक सीमित नहीं था।

 

IMG 20261030 153609

उनके लिए भारत की एकता उसकी विविधता को स्वीकार करने और उसे राष्ट्रीय शक्ति में बदलने की क्षमता में निहित थी। सरदार पटेल का व्यक्तित्व हमें यह भी सिखाता है कि राष्ट्र निर्माण केवल आदर्शवादी नारों से नहीं होता। इसके लिए दृढ़ इच्छाशक्ति, व्यावहारिक दृष्टिकोण, राजनीतिक परिपक्वता और कठिन निर्णय लेने का साहस आवश्यक है। वे ऐसे नेता थे, जिनके लिए राष्ट्रीय हित व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और राजनीतिक मतभेदों से ऊपर था। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में महात्मा गांधी के साथ मिलकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। खेड़ा सत्याग्रह और बारडोली आंदोलन के माध्यम से उन्होंने किसानों को संगठित किया और जनशक्ति की वास्तविक क्षमता का परिचय दिया। बारडोली आंदोलन की सफलता के बाद ही उन्हें ‘सरदार’ की उपाधि मिली। उनका संपूर्ण राजनीतिक जीवन इस बात का प्रमाण है कि जनविश्वास और संगठनात्मक क्षमता किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी पूंजी होते हैं। राष्ट्रीय एकता दिवस की स्थापना वर्ष 2014 में की गई थी। इसका उद्देश्य नागरिकों के बीच राष्ट्रीय एकता, अखंडता और सुरक्षा की भावना को मजबूत करना तथा सरदार पटेल के योगदान को जनमानस तक पहुंचाना है। इस अवसर पर देशभर में ‘रन फॉर यूनिटी’, शपथ ग्रहण समारोह, सांस्कृतिक कार्यक्रम, जनजागरूकता अभियान और विभिन्न शैक्षणिक गतिविधियों का आयोजन किया जाता है। इन आयोजनों का वास्तविक महत्व तभी है, जब इनके माध्यम से राष्ट्रीय एकता का विचार केवल औपचारिक कार्यक्रमों तक सीमित न रहकर नागरिकों के दैनिक व्यवहार और सामाजिक जीवन का हिस्सा बने। आज भारत विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्था होने के साथ-साथ अनेक भाषाओं, धर्मों, जातियों, संस्कृतियों और जीवनशैलियों का संगम है। हमारी विविधता ही हमारी सबसे बड़ी पहचान और ताकत है।

 

file 000000000004820bb4f2c55adab8e4e4

लेकिन यह विविधता तभी राष्ट्रीय शक्ति बन सकती है, जब उसके भीतर परस्पर सम्मान, समान अवसर और संवैधानिक विश्वास कायम रहे। भाषाई असहमति, जातिगत भेदभाव, धार्मिक कट्टरता, क्षेत्रीय संकीर्णता और सामाजिक असमानता जैसी समस्याएं समय-समय पर राष्ट्रीय एकता के सामने चुनौतियां खड़ी करती रही हैं। इन चुनौतियों का समाधान किसी एक समुदाय या वर्ग से अपेक्षित नहीं किया जा सकता। इसके लिए समाज, राजनीतिक नेतृत्व, प्रशासन, शैक्षणिक संस्थानों और नागरिक संगठनों को सामूहिक जिम्मेदारी निभानी होगी। वर्तमान समय में राष्ट्रीय एकता के सामने सबसे गंभीर चुनौतियों में सामाजिक ध्रुवीकरण और सार्वजनिक संवाद में बढ़ती कटुता भी शामिल हैं। लोकतंत्र में विचारों का अंतर स्वाभाविक है। असहमति लोकतांत्रिक व्यवस्था की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी जीवंतता का प्रमाण है। लेकिन जब राजनीतिक या वैचारिक मतभेद सामाजिक शत्रुता में बदलने लगते हैं, तब लोकतांत्रिक संस्थाओं और सामाजिक विश्वास दोनों को नुकसान पहुंचता है। किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र की मजबूती इस बात से तय नहीं होती कि वहां सभी नागरिक एक जैसा सोचते हैं, बल्कि इस बात से होती है कि अलग-अलग विचार रखने के बावजूद वे एक-दूसरे के अधिकारों और सम्मान की रक्षा करते हैं।

 

 

यहां राष्ट्रीय एकता का अर्थ समझना आवश्यक है। एकता का मतलब एकरूपता नहीं है। भारत की पहचान उसकी बहुलतावादी संस्कृति में है। कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से अरुणाचल प्रदेश तक खान-पान, पहनावे, भाषाओं और लोक परंपराओं में व्यापक अंतर दिखाई देता है, लेकिन इन तमाम भिन्नताओं के बीच एक साझा भारतीयता मौजूद है। संविधान ने इसी भारतीयता को समान नागरिकता, मौलिक अधिकारों, लोकतांत्रिक संस्थाओं और न्याय के सिद्धांतों के माध्यम से मजबूत आधार प्रदान किया है। इसलिए राष्ट्रीय एकता की रक्षा का अर्थ संविधान की भावना, कानून के शासन और नागरिकों की समान गरिमा की रक्षा करना भी है। राष्ट्रीय एकता का प्रश्न केवल धार्मिक या सांस्कृतिक सद्भाव तक सीमित नहीं है। आर्थिक असमानता, बेरोजगारी, गरीबी, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं में क्षेत्रीय अंतर भी राष्ट्रीय एकता को प्रभावित करते हैं। जब विकास के अवसर समाज के कुछ हिस्सों तक सीमित रह जाते हैं और बड़े वर्ग स्वयं को मुख्यधारा से अलग महसूस करने लगते हैं, तो असंतोष और अलगाव की भावनाएं जन्म ले सकती हैं। इसलिए मजबूत राष्ट्र के निर्माण के लिए विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना आवश्यक है।

file 0000000077608211a89154bfc9d4dd07

देश के प्रत्येक नागरिक को यह विश्वास होना चाहिए कि उसकी मेहनत, प्रतिभा और क्षमता के लिए समान अवसर उपलब्ध हैं। सामाजिक न्याय और आर्थिक समावेशन के बिना राष्ट्रीय एकता का विचार अधूरा है। इस संदर्भ में शिक्षा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों को केवल इतिहास की घटनाएं याद कराना पर्याप्त नहीं है। उन्हें इतिहास के पीछे छिपे मूल्यों, लोकतांत्रिक चेतना, संवैधानिक अधिकारों, नागरिक कर्तव्यों और सामाजिक सहिष्णुता का भी बोध कराया जाना चाहिए। नई पीढ़ी को यह समझना होगा कि भारत का निर्माण किसी एक व्यक्ति, एक समुदाय या एक कालखंड का परिणाम नहीं है। इसके पीछे असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों, किसानों, मजदूरों, आदिवासियों, महिलाओं, समाज सुधारकों और आम नागरिकों का संघर्ष शामिल है। सरदार पटेल का योगदान इसी व्यापक राष्ट्रीय यात्रा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है। आज डिजिटल युग में राष्ट्रीय एकता की चुनौतियों का स्वरूप भी बदल रहा है। सोशल मीडिया और डिजिटल मंचों ने सूचनाओं के आदान-प्रदान को आसान बनाया है, लेकिन इनके माध्यम से अफवाहों, भ्रामक सूचनाओं, नफरत भरे संदेशों और समाज को बांटने वाली सामग्री का प्रसार भी तेजी से होता है। कई बार बिना सत्यापन के साझा की गई एक सूचना सामाजिक तनाव का कारण बन जाती है। ऐसे समय में डिजिटल साक्षरता, तथ्य-जांच और जिम्मेदार अभिव्यक्ति का महत्व बढ़ जाता है।

 

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। नागरिकों को यह समझना होगा कि डिजिटल माध्यम पर किया गया व्यवहार भी राष्ट्र के सामाजिक वातावरण को प्रभावित करता है। राष्ट्रीय एकता की चर्चा में युवाओं की भूमिका को विशेष महत्व देना होगा। भारत की युवा आबादी उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। विज्ञान, तकनीक, खेल, शिक्षा, उद्यमिता, कला और प्रशासन सहित प्रत्येक क्षेत्र में युवा देश की नई संभावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। लेकिन युवा शक्ति का सही उपयोग तभी संभव है, जब उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार, कौशल विकास और सकारात्मक सामाजिक वातावरण मिले। युवाओं को जाति, धर्म और क्षेत्र की सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्र के व्यापक हित में सोचने के लिए प्रेरित करना होगा। उन्हें यह विश्वास दिलाना होगा कि भारत का भविष्य केवल सरकारों की नीतियों से नहीं, बल्कि उनके अपने प्रयासों, अनुशासन और नागरिक जिम्मेदारियों से भी तय होगा।

 

बिहार जैसे राज्यों के संदर्भ में राष्ट्रीय एकता का महत्व और भी व्यापक हो जाता है। बिहार की ऐतिहासिक विरासत में वैशाली की प्राचीन गणतांत्रिक परंपरा, मगध की राजनीतिक चेतना, बौद्ध और जैन दर्शन की मानवीय दृष्टि तथा स्वतंत्रता आंदोलन की गौरवशाली स्मृतियां शामिल हैं। इस धरती ने देश को अनेक महान स्वतंत्रता सेनानी, विचारक, समाज सुधारक और राजनीतिक नेतृत्व दिए हैं। राष्ट्रीय एकता की भावना को मजबूत करने में ऐसे राज्यों की भूमिका महत्वपूर्ण है, जिनकी ऐतिहासिक पहचान सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्रीय आंदोलनों से जुड़ी रही है। क्षेत्रीय गौरव और राष्ट्रीय पहचान एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। वास्तव में, अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करते हुए राष्ट्रीय एकता के प्रति प्रतिबद्ध रहना ही सच्ची भारतीयता है।सरदार पटेल की विरासत का एक महत्वपूर्ण पक्ष प्रशासनिक एकता और संस्थागत मजबूती भी है। उन्हें भारत की अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवाओं का महत्वपूर्ण संरक्षक माना जाता है। स्वतंत्रता के बाद उन्होंने प्रशासनिक ढांचे को स्थिर और सक्षम बनाए रखने पर विशेष बल दिया। उनका मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता को सफल बनाने के लिए एक निष्पक्ष, अनुशासित और उत्तरदायी प्रशासनिक व्यवस्था आवश्यक है। आज जब देश सुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही की अपेक्षा करता है, तब उनके विचारों की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। राष्ट्रीय एकता केवल सीमाओं की सुरक्षा से सुनिश्चित नहीं होती, यह भी आवश्यक है कि नागरिकों का शासन व्यवस्था और संवैधानिक संस्थाओं पर भरोसा कायम रहे। आज भारत के सामने वैश्विक स्तर पर भी अनेक चुनौतियां हैं। बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियां, सीमा सुरक्षा, आतंकवाद, साइबर अपराध, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दे राष्ट्रीय सामर्थ्य की परीक्षा लेते हैं। इन परिस्थितियों में आंतरिक एकजुटता का महत्व और बढ़ जाता है।

 

बाहरी चुनौतियों का सामना वही राष्ट्र प्रभावी ढंग से कर सकता है, जिसके नागरिकों के बीच विश्वास और साझा उद्देश्य की भावना मजबूत हो। राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सेना और सुरक्षा बलों की जिम्मेदारी नहीं है; यह नागरिकों की सतर्कता, सामाजिक सद्भाव, संस्थागत मजबूती और राष्ट्रीय अनुशासन से भी जुड़ी हुई है। यह भी आवश्यक है कि सरदार पटेल को केवल स्मारकों, प्रतिमाओं और समारोहों तक सीमित न कर दिया जाए। गुजरात में स्थित स्टैच्यू ऑफ यूनिटी उनके विराट व्यक्तित्व और योगदान का प्रतीक है, लेकिन किसी महापुरुष के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि उनके विचारों को व्यवहार में उतारने से मिलती है। उनके जीवन से हमें राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखने, कठिन परिस्थितियों में साहस दिखाने, संगठन की शक्ति पहचानने और सार्वजनिक जीवन में उत्तरदायित्व निभाने की प्रेरणा लेनी चाहिए। उनकी जयंती तभी सार्थक होगी, जब हम अपने सामाजिक व्यवहार में भेदभाव और वैमनस्य को कम करने का संकल्प लें।राष्ट्रीय एकता दिवस पर आयोजित होने वाली शपथ का वास्तविक अर्थ भी इसी में निहित है। राष्ट्र के प्रति निष्ठा का अर्थ केवल राष्ट्रीय ध्वज के सामने खड़े होकर संकल्प लेना नहीं, बल्कि दैनिक जीवन में संविधान के मूल्यों का सम्मान करना है।

 

किसी दूसरे नागरिक की भाषा, धर्म, जाति, संस्कृति अथवा क्षेत्रीय पहचान के कारण उसके साथ भेदभाव न करना भी राष्ट्रसेवा है। सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना, कानून का पालन करना, सामाजिक सद्भाव बनाए रखना और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति सम्मान रखना भी राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने वाले कार्य हैं। 31 अक्टूबर 2026 को सरदार वल्लभभाई पटेल की 151वीं जयंती के अवसर पर देश को यह आत्ममंथन करना चाहिए कि जिस अखंड भारत की कल्पना और स्थापना के लिए स्वतंत्रता के बाद असाधारण प्रयास किए गए थे, उसकी सामाजिक और वैचारिक एकता को मजबूत करने के लिए हम कितना प्रयास कर रहे हैं। इतिहास ने हमें एक भौगोलिक राष्ट्र दिया, संविधान ने उसे लोकतांत्रिक आधार प्रदान किया और नागरिकों की सामूहिक जिम्मेदारी उसे एक मजबूत, समावेशी और विकसित राष्ट्र बनाने की है।

 

सरदार पटेल ने अपने समय की सबसे बड़ी चुनौती का सामना करते हुए यह सिद्ध किया था कि दृढ़ इच्छाशक्ति और राष्ट्रीय प्रतिबद्धता के बल पर असंभव दिखाई देने वाले लक्ष्य भी हासिल किए जा सकते हैं। आज आवश्यकता उसी संकल्प को नए समय की चुनौतियों के अनुरूप आगे बढ़ाने की है। भारत की एकता किसी दबाव, भय या एकरूपता से नहीं, बल्कि आपसी विश्वास, समानता, न्याय और साझी नागरिकता से मजबूत होगी। यही राष्ट्रीय एकता दिवस का वास्तविक संदेश है और यही लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के प्रति राष्ट्र की सबसे बड़ी श्रद्धांजलि भी होगी।

Share This Article
राज्य प्रभारी
Follow:
हंसराज चौरसिया स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार एवं मीडिया कम्युनिकेशन से जुड़े पेशेवर हैं। वर्ष 2017 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हंसराज ने अपने करियर की शुरुआत स्वतंत्र प्रभात से की। बीते वर्षों में उन्होंने झारखंड के सामाजिक, राजनीतिक और जनसरोकार से जुड़े विषयों पर निरंतर लेखन, रिपोर्टिंग और ग्राउंड कवरेज किया है।उन्होंने विभिन्न चुनावों की प्रत्यक्ष एवं जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए चुनावी माहौल, जनमत, स्थानीय मुद्दों, राजनीतिक गतिविधियों और मतदाताओं के बीच जाकर रिपोर्टिंग का अनुभव हासिल किया है। क्षेत्रीय राजनीति और जनसरोकार के मुद्दों पर उनकी रिपोर्टिंग में स्थानीय परिस्थितियों और प्रत्यक्ष अनुभवों को विशेष महत्व मिलता है। वर्तमान में वे झारखंड दर्शन, खबर मन्त्र, स्वतंत्र प्रभात, अमर भास्कर, झारखंड न्यूज़24 एवं क्राफ्ट समाचार सहित विभिन्न मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए स्वतंत्र लेखन एवं रिपोर्टिंग कर रहे हैं। साथ ही झारखंड न्यूज़24 में राज्य प्रभारी के रूप में संपादकीय एवं संगठनात्मक जिम्मेदारी निभा रहे हैं। उनकी पत्रकारिता का प्रमुख फोकस जमीनी मुद्दे, सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिक विमर्श, आदिवासी समाज, राजनीति और जनहित से जुड़े विषयों पर रहा है। राजनीतिक संवाद एवं मीडिया कम्युनिकेशन के क्षेत्र में भी उन्हें व्यावहारिक अनुभव प्राप्त है। शैक्षणिक रूप से हंसराज वर्तमान में रांची विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर (2024–26) कर रहे हैं। साहित्यिक अध्ययन और पत्रकारिता के व्यावहारिक अनुभव का समन्वय उनके लेखन को विषयगत समझ, सामाजिक संवेदना और प्रभावी भाषा प्रदान करता है। हजारीबाग के बरगड्डा गांव से आने वाले हंसराज वर्तमान में रांची में रहते हैं और स्वतंत्र पत्रकारिता के माध्यम से झारखंड के सामाजिक, राजनीतिक एवं जनसरोकार से जुड़े विषयों को व्यापक विमर्श तक पहुंचाने के लिए सक्रिय हैं।
Leave a Comment