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खैरपाल बांग्ला क्लब एवं उत्कल क्लब का सिंदूर खेल के साथ माँ दुर्गा के प्रतिमा का हुआ विसर्जन
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खैरपाल बांग्ला क्लब एवं उत्कल क्लब का सिंदूर खेल के साथ माँ दुर्गा के प्रतिमा का हुआ विसर्जनपोटका प्रखण्ड में दुर्गा पूजा का रौनक अब थम गया है।खैरपाल बांग्ला क्लब का 21 अक्टूबर, बुधवार को एवं खैरपाल उत्कल क्लब का 22 अक्टूबर गुरुवार को सिंदूर खेल के साथ मां दुर्गा को नम आंखों से बिदाई दी गई।विसर्जन से पहले मां दुर्गा के सामने सदा सुहागन रहने के लिए उनका आशीर्वाद लेकर एक दूसरे को सिंदूर लगाया गया। सिंदूर खेल का महत्व दशमी के दिन सुहाग, सौभाग्य एवं आपसी भाईचारे के लिए किया जाता जाता है।• मां की विदाई और वरण: विजयादशमी पर मां दुर्गा की प्रतिमा विसर्जन से पहले ‘देवी बोरोन’ (वरण) की रस्म होती है। महिलाएं मां को पान के पत्ते से स्पर्श कराती हैं, उन्हें मिठाई और सिंदूर अर्पित करती हैं। सौभाग्य की कामना मां को सिंदूर चढ़ाने के बाद, विवाहित महिलाएं आपस में एक-दूसरे के माथे, गालों और सिंदूर की मांग में सिंदूर लगाती हैं।
यह रस्म पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य, सुखी वैवाहिक जीवन और परिवार में समृद्धि के आशीर्वाद के लिए भी की जाती है। और इस परंपरा के पीछे यह मान्यता है कि मां दुर्गा इन दिनों अपने मायके (पृथ्वी लोक) आती हैं और विजयादशमी के दिन अपने ससुराल कैलाश लौटती हैं। मां को एक बेटी की तरह विदा करते हुए महिलाएं सुखी जीवन की कामना करती हैं और अगले साल फिर आने का निमंत्रण देती हैं। इस दौरान महिलाएं विशेष रूप से पारंपरिक लाल बॉर्डर वाली सफेद या लाल-सफेद साड़ी (‘लाल पाड़ साड़ी’) पहनती हैं और हाथों में शंखा-पोला धारण करती हैं।खैरपाल दुर्गा पूजा में दोनों ही कमिटियों के द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसमें ओड़िया नाटक एते सपनोकु राती काहिं ओर बांग्ला नाटक भालोबाशार कसाईखाना का आयोजन किया गया । बांग्ला क्लब में दुर्गा वाहिनी के द्वारा शस्त्र पूजन का भी आयोजन किया गया।जिसमें अरुणा सारंगी ने शस्त्र पूजन एवं देवी शक्ति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मां दुर्गा शक्ति का प्रतीक है आज कहीं ना कहीं अपने संस्कारों से विमुख हो रही महिला जो आने वाले पीढ़ी को खराब कर सकती है।मुखिया देवी कुमारी ने कहा जहां शिक्षा में महिलाएं आगे बढ़ कर देश का नाम रोशन कर रही वहीं कई अपने दिशा से भ्रमित होकर गलत दिशा में जा रहे हैं और समाज में नारी शक्ति को कलंकित कर रहे हैं।खैरपाल में शांतिपूर्ण ढंग से दुर्गा पूजा संपन्न हुआ ।
पोटका से सुरेश कुमार महापात्र की रिपोर्ट
पोटका प्रखण्ड में दुर्गा पूजा का रौनक अब थम गया है।खैरपाल बांग्ला क्लब का 21 अक्टूबर, बुधवार को एवं खैरपाल उत्कल क्लब का 22 अक्टूबर गुरुवार को सिंदूर खेल के साथ मां दुर्गा को नम आंखों से बिदाई दी गई।विसर्जन से पहले मां दुर्गा के सामने सदा सुहागन रहने के लिए उनका आशीर्वाद लेकर एक दूसरे को सिंदूर लगाया गया। सिंदूर खेल का महत्व दशमी के दिन सुहाग, सौभाग्य एवं आपसी भाईचारे के लिए किया जाता जाता है।• मां की विदाई और वरण: विजयादशमी पर मां दुर्गा की प्रतिमा विसर्जन से पहले ‘देवी बोरोन’ (वरण) की रस्म होती है। महिलाएं मां को पान के पत्ते से स्पर्श कराती हैं, उन्हें मिठाई और सिंदूर अर्पित करती हैं। सौभाग्य की कामना मां को सिंदूर चढ़ाने के बाद, विवाहित महिलाएं आपस में एक-दूसरे के माथे, गालों और सिंदूर की मांग में सिंदूर लगाती हैं।
यह रस्म पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य, सुखी वैवाहिक जीवन और परिवार में समृद्धि के आशीर्वाद के लिए भी की जाती है। और इस परंपरा के पीछे यह मान्यता है कि मां दुर्गा इन दिनों अपने मायके (पृथ्वी लोक) आती हैं और विजयादशमी के दिन अपने ससुराल कैलाश लौटती हैं। मां को एक बेटी की तरह विदा करते हुए महिलाएं सुखी जीवन की कामना करती हैं और अगले साल फिर आने का निमंत्रण देती हैं। इस दौरान महिलाएं विशेष रूप से पारंपरिक लाल बॉर्डर वाली सफेद या लाल-सफेद साड़ी (‘लाल पाड़ साड़ी’) पहनती हैं और हाथों में शंखा-पोला धारण करती हैं।खैरपाल दुर्गा पूजा में दोनों ही कमिटियों के द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसमें ओड़िया नाटक एते सपनोकु राती काहिं ओर बांग्ला नाटक भालोबाशार कसाईखाना का आयोजन किया गया । बांग्ला क्लब में दुर्गा वाहिनी के द्वारा शस्त्र पूजन का भी आयोजन किया गया।जिसमें अरुणा सारंगी ने शस्त्र पूजन एवं देवी शक्ति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मां दुर्गा शक्ति का प्रतीक है आज कहीं ना कहीं अपने संस्कारों से विमुख हो रही महिला जो आने वाले पीढ़ी को खराब कर सकती है।मुखिया देवी कुमारी ने कहा जहां शिक्षा में महिलाएं आगे बढ़ कर देश का नाम रोशन कर रही वहीं कई अपने दिशा से भ्रमित होकर गलत दिशा में जा रहे हैं और समाज में नारी शक्ति को कलंकित कर रहे हैं।खैरपाल में शांतिपूर्ण ढंग से दुर्गा पूजा संपन्न हुआ ।
यह रस्म पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य, सुखी वैवाहिक जीवन और परिवार में समृद्धि के आशीर्वाद के लिए भी की जाती है। और इस परंपरा के पीछे यह मान्यता है कि मां दुर्गा इन दिनों अपने मायके (पृथ्वी लोक) आती हैं और विजयादशमी के दिन अपने ससुराल कैलाश लौटती हैं। मां को एक बेटी की तरह विदा करते हुए महिलाएं सुखी जीवन की कामना करती हैं और अगले साल फिर आने का निमंत्रण देती हैं। इस दौरान महिलाएं विशेष रूप से पारंपरिक लाल बॉर्डर वाली सफेद या लाल-सफेद साड़ी (‘लाल पाड़ साड़ी’) पहनती हैं और हाथों में शंखा-पोला धारण करती हैं।खैरपाल दुर्गा पूजा में दोनों ही कमिटियों के द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसमें ओड़िया नाटक एते सपनोकु राती काहिं ओर बांग्ला नाटक भालोबाशार कसाईखाना का आयोजन किया गया । बांग्ला क्लब में दुर्गा वाहिनी के द्वारा शस्त्र पूजन का भी आयोजन किया गया।जिसमें अरुणा सारंगी ने शस्त्र पूजन एवं देवी शक्ति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मां दुर्गा शक्ति का प्रतीक है आज कहीं ना कहीं अपने संस्कारों से विमुख हो रही महिला जो आने वाले पीढ़ी को खराब कर सकती है।मुखिया देवी कुमारी ने कहा जहां शिक्षा में महिलाएं आगे बढ़ कर देश का नाम रोशन कर रही वहीं कई अपने दिशा से भ्रमित होकर गलत दिशा में जा रहे हैं और समाज में नारी शक्ति को कलंकित कर रहे हैं।खैरपाल में शांतिपूर्ण ढंग से दुर्गा पूजा संपन्न हुआ ।

